प्रवृत्तनक्तंदिवसंधिदीप्तै-
र्नभस्तलं गां च पिशङ्गयष्टिः ।
अन्तर्हितार्कैः परितः पतद्भि-
श्छायाः समाचिक्षिपिरे वनानाम् ॥
प्रवृत्तनक्तंदिवसंधिदीप्तै-
र्नभस्तलं गां च पिशङ्गयष्टिः ।
अन्तर्हितार्कैः परितः पतद्भि-
श्छायाः समाचिक्षिपिरे वनानाम् ॥
र्नभस्तलं गां च पिशङ्गयष्टिः ।
अन्तर्हितार्कैः परितः पतद्भि-
श्छायाः समाचिक्षिपिरे वनानाम् ॥
अन्वयः
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प्रवृत्त-नक्तंदिव-संधि-दीप्तैः, नभस्तलम् गाम् च पिशङ्गयद्भिः, अन्तर्हित-अर्कैः, परितः पतद्भिः (गरुडैः) वनानाम् छायाः समाचिक्षिपिरे।
English Summary
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The shadows of the forests were thrown into confusion by the Garudas, who were falling from all sides, whose splendor resembled the twilight glow, who made the sky and earth tawny, and whose bodies concealed the sun.
सारांश
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सूर्य को ढककर चारों ओर गिरते हुए गरुड़ों की पीली आभा ने आकाश और पृथ्वी को रंजित कर दिया, जिससे वनों की छाया भी लुप्त हो गई।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रवृत्तेति ॥ नक्तं च दिवा च नक्तंदिवम् ।
अचतुर- (अष्टाध्यायी ५.४.७७ ) इत्यादिना सप्तम्यर्थवृत्त्योरप्यव्यव्योर्द्वन्द्वैकवद्भावनिपाते समासान्तः । लक्षणया त्वहोरात्रमात्रवाची । प्रवृत्तः प्रादुर्भूतो यो नक्तंदिवस्य संधिः संध्या तद्वद्दीप्तै: शोभितैर्नभस्तलं गां भुवं च पिशङ्गयद्भिः पिशङ्गीकुर्वद्भिरन्तर्हित आच्छादितोऽर्को यैस्तैः पतद्भिः पक्षिभिः परितः सर्वतो वनाना छायाः समाचिक्षिपिरे समाक्षिप्ताः । अन्तर्बहिश्च तेजःप्रवेशात्क्वाप्यन्तर्हिता इत्यर्थः ॥ स भोगिसंघः शममुग्रधाम्नां सैन्येन निन्ये विनतासुतानाम् । महाध्वरे विध्यपचारदोषः कर्मान्तरेणेव महोदयेन
पदच्छेदः
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| प्रवृत्तनक्तंदिवसंधिदीप्तैः | प्रवृत्त–नक्तंदिव–संधि–दीप्त (३.३) | by those whose splendor was like the twilight glow |
| नभस्तलम् | नभस्–तल (२.१) | the surface of the sky |
| गाम् | गो (२.१) | the earth |
| च | च | and |
| पिशङ्गयद्भिः | पिशङ्गयत् (√पिशङ्ग+णिच्+शतृ, ३.३) | by those making tawny |
| अन्तर्हितार्कैः | अन्तर्हित–अर्क (३.३) | by whom the sun was concealed |
| परितः | परितः | from all sides |
| पतद्भिः | पतत् (√पत्+शतृ, ३.३) | by the falling ones |
| छायाः | छाया (१.३) | the shadows |
| समाचिक्षिपिरे | समाचिक्षिपिरे (सम्+आ√क्षिप् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | were thrown into confusion |
| वनानाम् | वन (६.३) | of the forests |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | वृ | त्त | न | क्तं | दि | व | सं | धि | दी | प्तै |
| र्न | भ | स्त | लं | गां | च | पि | श | ङ्ग | य | ष्टिः |
| अ | न्त | र्हि | ता | र्कैः | प | रि | तः | प | त | द्भि |
| श्छा | याः | स | मा | चि | क्षि | पि | रे | व | ना | नाम् |
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