अन्वयः
AI
हिमाचलः दरी-मुखैः आसव-राग-ताम्रम् विकासि रुक्म-छद-धाम पीत्वा, जव-अनिल-आघूर्णित-सानु-जालः (सन्) क्षीबः इव आचकम्पे।
English Summary
AI
The Himalaya mountain, having drunk with its cave-mouths the expanding splendor of the golden-winged Garudas, which was red like the color of liquor, and having its network of peaks shaken by the swift wind, trembled as if intoxicated.
सारांश
AI
गरुड़ों के स्वर्णमयी पंखों की चमक को मदिरा की भांति पीकर और उनके पंखों की वायु से कांपते पर्वतों वाला हिमालय किसी मतवाले व्यक्ति की तरह डगमगाने लगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दरीति॥जवानिलेनाघूर्णितानि भ्रमितानि सानुजालानि यस्य स हिमाचलः।आसवस्य रागो रक्तता तद्वत्ताम्राम् । गुणयोरेवोपमानोपमेयभावः । विकासि विकस्वरं रुक्मच्छदाः सुवर्णपक्षास्तार्क्ष्यास्तेषां धाम तेजो दरीभिर्मुखैरिव दरीमुखैः पीत्वा क्षीबो मत्त इवाचकम्प आचचाल । उपमाव्यापितेयमुत्प्रेक्षा ॥
पदच्छेदः
AI
| दरीमुखैः | दरी–मुख (३.३) | with its cave-mouths |
| आसवरागताम्रम् | आसव–राग–ताम्र (२.१) | red like the color of liquor |
| विकासि | विकासिन् (वि√कस्+णिनि, २.१) | expanding |
| रुक्मच्छदधाम | रुक्म–छद–धामन् (२.१) | the splendor of the golden-winged ones |
| पीत्वा | पीत्वा (√पा+क्त्वा) | having drunk |
| जवानिलाघूर्णितसानुजालः | जव–अनिल–आघूर्णित (आ√घूर्ण्+क्त)–सानु–जाल (१.१) | whose network of peaks was shaken by the swift wind |
| हिमाचलः | हिमाचल (१.१) | the Himalaya mountain |
| क्षीबः | क्षीब (√क्षीब्+क्त, १.१) | intoxicated |
| इव | इव | as if |
| आचकम्पे | आचकम्पे (आ√कम्प् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | trembled |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | री | मु | खै | रा | स | व | रा | ग | ता | म्रं |
| वि | का | सि | रु | क्म | च्छ | द | धा | म | पी | त्वा |
| ज | वा | नि | ला | घू | र्णि | त | सा | नु | जा | लो |
| हि | मा | च | लः | क्षी | ब | इ | वा | च | क | म्पे |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.