अन्वयः
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(अस्य) अंसौ अवष्टब्धनतौ (स्तः)। शिरोधरायाः समाधिः रहितप्रयासः (अस्ति)। विकारान् त्यजता मुखेन शशलाञ्छनस्य प्रसादलक्ष्मीः धृता।
English Summary
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His shoulders are held firm yet bent. The steadiness of his neck is effortless. His face, abandoning all contortions of effort, holds the graceful beauty of the moon.
सारांश
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अर्जुन के कंधे झुके हुए और स्थिर हैं, ग्रीवा यत्नशून्य है और उनका मुख विकारों से रहित चंद्रमा की कांति के समान प्रसन्नता बिखेर रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अंसाविति ॥ किं च । अंसाववष्टब्धौ स्थिराववस्थापितौ च तौ नतौ चावष्टन्धनतौ शिरोधरायाः कंधरायाः समाधिः संस्थानविशेषै रहितः प्रयासो यस्य स तथोक्तः । निःप्रयास इत्यर्थः । तथा विकारांस्त्यजता । जितश्रमत्वान्निर्विकारणेत्यर्थः । मुखेन शशलाञ्छनस्येन्दोः प्रसादलक्ष्मीर्धृता । असंभवत्संबन्धो निदर्शनालंकारः ॥
पदच्छेदः
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| अंसौ | अंस (१.२) | His shoulders |
| अवष्टब्धनतौ | अवष्टब्ध–नत (१.२) | firm and bent |
| समाधिः | समाधि (१.१) | The steadiness |
| शिरोधरायाः | शिरोधरा (६.१) | of his neck |
| रहितप्रयासः | रहित–प्रयास (१.१) | without effort |
| धृता | धृत (√धृ+क्त, १.१) | is held |
| विकारान् | विकार (२.३) | contortions |
| त्यजता | त्यजत् (√त्यज्+शतृ, ३.१) | by the abandoning |
| मुखेन | मुख (३.१) | face |
| प्रसादलक्ष्मीः | प्रसाद–लक्ष्मी (१.१) | the graceful beauty |
| शशलाञ्छनस्य | शशलाञ्छन (६.१) | of the moon |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अं | सा | व | व | ष्ट | ब्ध | न | तौ | स | मा | धिः |
| शि | रो | ध | रा | या | र | हि | त | प्र | या | सः |
| धृ | ता | वि | का | रां | स्त्य | ज | ता | मु | खे | न |
| प्र | सा | द | ल | क्ष्मीः | श | श | ला | ञ्छ | न | स्य |
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