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॥ अथ चतुर्दशः सर्गः ॥
१४.१
ततः किरातस्य वचोभिरुद्धतैः
पराहतः शैल इवार्णवाम्बुभिः ।
जहौ न धैर्यं कुपितोऽपि पाण्डवः
सुदुर्ग्रहान्तःकरणा हि साधवः ॥
सारांश AI समुद्र की लहरों से टकराए पर्वत के समान, किरात के उद्धत वचनों से आहत होने पर भी पाण्डुपुत्र अर्जुन ने धैर्य नहीं छोड़ा, क्योंकि सज्जनों का अंतःकरण अत्यंत दृढ़ होता है।
१४.२
सलेशमुल्लिङ्गितशात्रवेङ्गितः
कृती गिरां विस्तरतत्त्वसंग्रहे ।
अयं प्रमाणीकृतकालसाधनः
प्रशान्तसंरम्भ इवाददे वचः ॥
सारांश AI शत्रु के संकेतों को सूक्ष्मता से समझने वाले और वाणी के मर्म को जानने वाले कुशल अर्जुन ने समय और परिस्थिति का विचार कर शांत भाव से वचन कहना आरम्भ किया।
१४.३
विविक्तवर्णाभरणा सुखश्रुतिः
प्रसादयन्ती हृदयान्यपि द्विषाम् ।
प्रवर्तते नाकृतपुण्यकर्मणां
प्रसन्नगम्भीरपदा सरस्वती ॥
सारांश AI स्पष्ट वर्णों वाली, सुनने में सुखद और शत्रुओं के हृदय को भी प्रसन्न करने वाली ऐसी गम्भीर एवं निर्मल वाणी बिना पूर्व के पुण्य कर्मों के सिद्ध नहीं होती।
१४.४
भवन्ति ते सभ्यतमा विपश्चितां
मनोगतं वाचि निवेशयन्ति ये ।
नयन्ति तेष्वप्युपपन्ननैपुणा
गम्भीरमर्थं कतिचित्प्रकाशताम् ॥
सारांश AI जो विद्वान अपने मन के भावों को वाणी में व्यक्त करते हैं, वे सभा में श्रेष्ठ माने जाते हैं, परंतु उनमें भी कुछ ही कुशल लोग गम्भीर अर्थ को स्पष्टता से प्रकट कर पाते हैं।
१४.५
स्तुवन्ति गुर्वीमभिधेयसम्पदं
विशुद्धिमुक्तेरपरे विपश्चितः ।
इति स्थितायां प्रतिपूरुषं रुचौ
सुदुर्लभाः सर्वमनोरमा गिरः ॥
सारांश AI कुछ विद्वान अर्थ की महत्ता की प्रशंसा करते हैं तो कुछ वाणी की स्पष्टता की। व्यक्तियों की अलग-अलग रुचियों के कारण सभी को प्रिय लगने वाली वाणी अत्यंत दुर्लभ है।
१४.६
समस्य सम्पादयता गुणैरिमां
त्वया समारोपितभार भारतीम् ।
प्रगल्भमात्मा धुरि धुर्य वाग्मिनां
वनचरेणापि सताधिरोपितः ॥
सारांश AI हे वनवासी! गुणों से युक्त इस प्रभावशाली वाणी का प्रयोग कर तुमने स्वयं को वक्ताओं में श्रेष्ठ सिद्ध किया है और मुझ पर भी उत्तर देने का भार डाल दिया है।
१४.७
प्रयुज्य सामाचरितं विलोभनं
भयं विभेदाय धियः प्रदर्शितम् ।
तथाभियुक्तं च शिलीमुखार्थिना
यथेतरन्न्याय्यमिवावभासते ॥
सारांश AI तुमने प्रलोभन और भय का प्रयोग कर बुद्धि को विचलित करने का प्रयास किया है। बाण की इच्छा रखने वाले तुम्हारे तर्क इस प्रकार दिए गए हैं कि अनुचित भी उचित प्रतीत होता है।
१४.८
विरोधि सिद्धेरिति कर्तुमुद्यतः
स वारितः किं भवता न भूपतिः ।
हिते नियोज्यः खलु भूतिमिच्छता
सहार्थनाशेन नृपोऽनुजीविना ॥
सारांश AI कल्याण चाहने वाले सेवक को चाहिए कि वह राजा को विनाशकारी कार्यों से रोके। क्या तुमने अपने राजा को इस अनुचित कार्य से नहीं रोका जो उसकी सफलता में बाधक है?
१४.९
ध्रुवं प्रणाशः प्रहितस्य पत्त्रिणः
शिलोच्चये तस्य विमार्गणं नयः ।
न युक्तमत्रार्यजनातिलङ्घनं
दिशत्यपायं हि सतामतिक्रमः ॥
सारांश AI पर्वत पर चलाए गए बाण का नष्ट होना निश्चित है, उसे ढूँढना ही नीति है। यहाँ सज्जनों की मर्यादा का उल्लंघन उचित नहीं, क्योंकि महापुरुषों का तिरस्कार केवल विनाश लाता है।
१४.१०
अतीतसंख्या विहिता ममाग्निना
शिलामुखाः खाण्डवमत्तुमिच्छता ।
अनादृतस्यामरसायकेष्वपि
स्थिता कथं शैलजनाशुगे धृतिः ॥
सारांश AI खाण्डव वन दहन के समय अग्निदेव ने मुझे अनगिनत बाण दिए थे। जिसने दिव्य अस्त्रों का भी तिरस्कार किया हो, उसकी निष्ठा एक किरात के साधारण बाणों में कैसे हो सकती है?
१४.११
यदि प्रमाणीकृतमार्यचेष्टितं
किमित्यदोषेण तिरस्कृता वयम् ।
अयातपूर्वा परिवादगोचरं
सतां हि वाणी गुणमेव भाषते ॥
सारांश AI यदि सज्जनों का आचरण ही प्रमाण है, तो तुमने निष्पाप मुझ पर आक्षेप क्यों लगाया? सज्जनों की वाणी कभी निंदा नहीं करती, वह सदैव गुणों का ही विवेचन करती है।
१४.१२
गुणापवादेन तदन्यरोपणा-
द्भृशाधिरूढस्य समञ्जसं जनम् ।
द्विधेव कृत्वा हृदयं निगूहतः
स्फुरदसाधोर्विवृणोति वागसिः ॥
सारांश AI दुर्जन व्यक्ति के हृदय के कपट और गुणों के प्रति द्वेष को उसकी वाणी ही प्रकट कर देती है, जो सज्जन व्यक्ति के हृदय को आहत करने वाली तलवार के समान होती है।
१४.१३
वनाश्रयाः कस्य मृगाः परिग्रहाः
शृणाति यस्तान्प्रसभेन तस्य ते ।
प्रहीयतामत्र नृपेण मानिता
न मानिता चास्ति भवन्ति च श्रियः ॥
सारांश AI वन में रहने वाले मृग भला किसके पालतू हैं? जो उन्हें बलपूर्वक मारता है, वे उसी के होते हैं। यहाँ राजा का गर्व व्यर्थ है, क्योंकि लक्ष्मी और मान सदा स्थिर नहीं रहते।
१४.१४
न वर्त्म कस्मैचिदपि प्रदीयता-
मिति व्रतं मे विहितं महर्षिणा ।
जिघांसुरस्मान्निहतो मया मृगो
व्रताभिरक्षा हि सतामलंक्रिया ॥
सारांश AI 'किसी को मार्ग न दो' ऐसा व्रत मुझे महर्षि ने दिया है। मुझ पर आक्रमण करने की इच्छा रखने वाले मृग को मैंने मारा है, क्योंकि अपने व्रत की रक्षा करना ही सज्जनों का आभूषण है।
१४.१५
मृगान्विनिघ्नन्मृगयुः स्वहेतुना
कृतोपकारः कथमिच्छतां तपः ।
कृपेति चेदस्तु मृगः क्षतः क्षणा-
दनेन पूर्वं न मयेति का गतिः ॥
सारांश AI स्वार्थ के लिए मृगों को मारने वाला शिकारी तपस्वियों का उपकारी कैसे हो सकता है? यदि दया की बात है, तो यह कहना व्यर्थ है कि मृग को पहले उसने मारा, मैंने नहीं।
१४.१६
अनायुधे सत्त्वजिघांसिते मुनौ
कृपेति वृत्तिर्महतामकृत्रिमा ।
शरासनं बिभ्रति सज्यसायकं
कृतानुकम्पः स कथं प्रतीयते ॥
सारांश AI शस्त्रहीन मुनि पर प्रहार करने वाले के प्रति दया महान पुरुषों का सहज स्वभाव है, किंतु जो धनुष-बाण धारण किए हुए युद्ध के लिए तैयार हो, उस पर दया करना संभव नहीं।
१४.१७
अथो शरस्तेन मदर्थमुज्झितः
फलं च तस्य प्रतिकायसाधनम् ।
अविक्षते तत्र मयात्मसात्कृते
कृतार्थता नन्वधिका चमूपतेः ॥
सारांश AI यदि उसने मेरे लिए बाण छोड़ा और उससे शत्रु का विनाश हुआ, तो लक्ष्य सिद्ध होने पर उस फल को पाकर तुम्हारे सेनापति की कृतार्थता तो और भी बढ़ जानी चाहिए।
१४.१८
यदात्थ कामं भवता स याच्यता-
मिति क्षमं नैतदनल्पचेतसाम् ।
कथं प्रसह्याहरणैषिणां प्रियः
परावनत्या मलिनीकृताः श्रियः ॥
सारांश AI जो तुम कहते हो कि अपनी इच्छा माँग लो, वह स्वाभिमानी पुरुषों के योग्य नहीं है। बलपूर्वक विजय चाहने वालों को दूसरों के सामने झुककर मिली हुई लक्ष्मी प्रिय नहीं होती।
१४.१९
अभूतमासज्य विरुद्धमीहितं
बलादलभ्यं तव लिप्सते नृपः ।
विजानतोऽपि ह्यनयस्य रौद्रतां
भवत्यपाये परिमोहिनी मतिः ॥
सारांश AI तुम्हारा राजा असंभव और अनुचित वस्तु को बलपूर्वक पाने की इच्छा कर रहा है। नीति के दुष्परिणामों को जानते हुए भी विनाश के समय मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है।
१४.२०
असिः शरा वर्म धनुश्च नोच्चकै-
र्विविच्य किं प्रार्थितमीश्वरेण ते ।
अथास्ति शक्तिः कृतमेव याच्ञया
न दूषितः शक्तिमतां स्वयंग्रहः ॥
सारांश AI तुम्हारे स्वामी ने तलवार, बाण, कवच या धनुष में से क्या माँगा है? यदि शक्ति है तो याचना व्यर्थ है, क्योंकि समर्थ पुरुषों द्वारा स्वयं ग्रहण करना दोषपूर्ण नहीं माना जाता।
१४.२१
सखा स युक्तः कथितः कथं त्वया
यदृच्छयासूयति यस्तपस्यते ।
गुणार्जनोच्छ्रायविरुद्धबुद्धयः
प्रकृत्यमित्रा हि सतामसाधवः ॥
सारांश AI वह कैसा मित्र जो ईर्ष्यावश तपस्या में विघ्न डाले? दुर्जन स्वाभाविक रूप से सज्जनों के शत्रु होते हैं क्योंकि उनकी बुद्धि गुणों की वृद्धि के विपरीत होती है।
१४.२२
वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणोचिताः
क्व जातिहीना मृगजीवितच्छिदः ।
सहापकृष्टैर्महतां न संगतं
भवन्ति गोमायुसखा न दन्तिनः ॥
सारांश AI हम वनवासी शिकारी और तुम वर्णाश्रम के रक्षक; हमारा मेल असंभव है। श्रेष्ठ जन नीचों का साथ नहीं देते, जैसे हाथी सियारों से मित्रता नहीं करते।
१४.२३
परोऽवजानाति यदज्ञताजड-
स्तदुन्नतानां न विहन्ति धीरताम् ।
समानवीर्यान्वयपौरुषेषु यः
करोत्यतिक्रान्तिमसौ तिरस्क्रिया ॥
सारांश AI अज्ञानी द्वारा किया गया अनादर धैर्यवानों को विचलित नहीं करता। तिरस्कार वही है जो समान शक्ति, कुल और पुरुषार्थ वाले व्यक्तियों के मध्य होता है।
१४.२४
यदा विगृह्णाति हतं तदा यशः
करोति मैत्रीमथ दूषिता गुणाः ।
स्थितिं समीक्ष्योभयथा परीक्षकः
करोत्यवज्ञोपहतं पृथग्जनम् ॥
सारांश AI शत्रुता यश का नाश करती है और कुसंगति गुणों को मलिन। बुद्धिमान व्यक्ति परिणामों पर विचार कर नीच पुरुषों की उपेक्षा करना ही उचित समझते हैं।
१४.२५
मया मृगान्हन्तुरनेन हेतुना
विरुद्धमाक्षेपवचस्तितिक्षितम् ।
शरार्थमेष्यत्यथ लप्स्यते गतिं
शिरोमणिं दृष्टिविषाज्जिघृक्षतः ॥
सारांश AI मृग वध के कारण मैंने इसके कटु वचन सहे, किंतु अब बाण के लिए आने पर इसकी वही गति होगी जो सर्प की मणि छीनने वाले की होती है।
१४.२६
इतीरिताकूतमनीलवाजिनं
जयाय दूतः प्रतितर्ज्य तेजसा ।
ययौ समीपं ध्वजिनीमुपेयुषः
प्रसन्नरूपस्य विरूपचक्षुषः ॥
सारांश AI दूत अर्जुन को चुनौती देकर अपने स्वामी शिव (किरात वेशधारी) के पास लौट गया, जो सेना के साथ प्रसन्न मुद्रा में खड़े थे।
१४.२७
ततोऽपवादेन पताकिनीपते-
श्चचाल निर्ह्रादवती महाचमूः ।
युगान्तवाताभिहतेव कुर्वती
निनादमम्भोनिधिवीचिसंहतिः ॥
सारांश AI सेनापति के संकेत पर वह विशाल किरात सेना प्रलयकालीन समुद्र की लहरों की भाँति भयंकर गर्जना करती हुई युद्ध के लिए चल पड़ी।
१४.२८
रणाय जैत्रः प्रदिशन्निव त्वरां
तरङ्गितालम्बितकेतुसंततिः ।
पुरो बलानां सघनाम्बुशीकरः
शनैः प्रतस्थे सुरभिः समीरणः ॥
सारांश AI फहराती ध्वजाओं वाली उस सेना के आगे शीतल और सुगंधित वायु धीरे-धीरे बहने लगी, मानो वह विजय के लिए उन्हें शीघ्रता का संदेश दे रही हो।
१४.२९
जयारवक्ष्वेडितनादमूर्छितः
शरासनज्यातलवारणध्वनिः ।
असम्भवन्भूधरराजकुक्षिषु
प्रकम्पयन्गामवतस्तरे दिशः ॥
सारांश AI प्रत्यंचा की टंकार और वीरों के जयघोष से उत्पन्न ध्वनि पर्वतों की कंदराओं को प्रतिध्वनित करती हुई पृथ्वी और दिशाओं में फैल गई।
१४.३०
निशातरौद्रेषु विकासतां गतैः
प्रदीपयद्भिः ककुभामिवान्तरम् ।
वनेसदां हेतिषु भिन्नविग्रहै-
र्विपुस्फुरे रश्मिमतो मरीचिभिः ॥
सारांश AI वनवासियों के चमकते हुए शस्त्र सूर्य की किरणों को परावर्तित कर दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे, मानो वन में दीपों की पंक्ति जल रही हो।
१४.३१
उदूढवक्षःस्थगितैकदिङ्मुखो
विकृष्टविस्फारितचापमण्डलः ।
वितत्य पक्षद्वयमायतं बभौ
विभुर्गुणानामुपरीव मध्यगः ॥
सारांश AI अपनी सेना के मध्य स्थित भगवान शिव अपने विशाल वक्ष और धनुष मण्डल के साथ ऐसे सुशोभित हुए मानो उन्होंने अपने गुणों पर पंख फैला रखे हों।
१४.३२
सुगेषु दुर्गेषु च तुल्यविक्रमै-
र्जवादहंपूर्विकया यियासुभिः ।
गणैरविच्छेदनिरुद्धमाबभौ
वनं निरुच्छ्वासमिवाकुलाकुलम् ॥
सारांश AI एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगी वह तीव्रगामी सेना सुगम और दुर्गम मार्गों पर इस प्रकार भर गई कि वन में वायु संचार भी रुक गया।
१४.३३
तिरोहितश्वभ्रनिकुञ्चरोधसः
समश्नुवानाः सहसातिरिक्तताम् ।
किरातसैन्यैरपिधाय रेचिता
भुवः क्षणं निम्नतयेव भेजिरे ॥
सारांश AI गड्ढों और घाटियों को पाटती हुई वह विशाल किरात सेना अचानक सर्वत्र व्याप्त हो गई, जिससे पृथ्वी उनके भार से नीचे की ओर धंसी हुई प्रतीत हुई।
१४.३४
पृथूरुपर्यस्तबृहल्लतातति-
र्जवानिलाघूर्णितशालचन्दना ।
गणाधिपानां परितः प्रसारिणी
वनान्यवाञ्चीव चकार संहतिः ॥
सारांश AI लताओं और वृक्षों को झकझोरती हुई गणपतियों की वह सेना चारों ओर इस प्रकार फैल गई कि उसने पूरे वन को मानो नीचे झुका दिया हो।
१४.३५
ततः सदर्पं प्रतनुं तपस्यया
मदस्रुतिक्षाममिवैकवारणम् ।
परिज्वलन्तं निधनाय भूभृतां
दहन्तमाशा इव जातवेदसम् ॥
सारांश AI तब उन्होंने तपस्या से क्षीण किंतु गर्वित अर्जुन को देखा, जो प्रलय की अग्नि के समान अपनी आभा से दिशाओं को प्रज्वलित कर रहे थे।
१४.३६
अनादरोपात्तधृतैकसायकं
जयेऽनुकूले सुहृदीव सस्पृहम् ।
शनैरपूर्णप्रतिकारपेलवे
निवेशयन्तं नयने बलोदधौ ॥
सारांश AI सहज भाव से एक बाण धारण किए हुए अर्जुन उस विशाल सेना को इस प्रकार देख रहे थे मानो किसी मित्र की प्रतीक्षा कर रहे हों।
१४.३७
निषण्णमापत्प्रतिकारकारणे
शरासने धैर्य इवानपायिनि ।
अलङ्घनीयं प्रकृतावपि स्थितं
निवातनिष्कम्पमिवापगापतिम् ॥
सारांश AI अपने अक्षय धैर्य और धनुष के सहारे स्थित अर्जुन प्राकृतिक रूप से शांत किंतु अलंघनीय समुद्र की भाँति अडिग खड़े थे।
१४.३८
उपेयुषीं बिभ्रतमन्तकद्युतिं
वधाददूरे पतितस्य दंष्ट्रिणः ।
पुरः समावेशितसत्पशुं द्विजैः
पतिं पशूनामिव हूतमध्वरे ॥
सारांश AI यमराज के समान तेजस्वी अर्जुन मृत वराह के समीप ऐसे सुशोभित थे मानो यज्ञ में पशु बलि के लिए स्वयं पशुपति उपस्थित हुए हों।
१४.३९
निजेन नीतं विजितान्यगौरवं
गभीरतां धैर्यगुणेन भूयसा ।
वनोदयेनेव घनोरुवीरुधा
समन्धकारीकृतमुत्तमाचलम् ॥
सारांश AI अपने अगाध धैर्य से दूसरों के मान को क्षीण करने वाले अर्जुन घनी वनस्पतियों से युक्त किसी विशाल और गंभीर पर्वत के समान प्रतीत हो रहे थे।
१४.४०
महर्षभस्कन्धमनूनकंधरं
बृहच्छिलावप्रघनेन वक्षसा ।
समुज्जिहीर्षुं जगतीं महाभरां
महावराहं महतोऽर्णवादिव ॥
सारांश AI वृषभ के समान कंधों और सुदृढ़ वक्षस्थल वाले अर्जुन उस महावराह के समान लग रहे थे जो समुद्र से पृथ्वी का उद्धार करने के लिए उद्यत हों।
१४.४१
हरिन्मणिश्याममुदग्रविग्रहं
प्रकाशमानं परिभूय देहिनः ।
मनुष्यभावे पुरुषं पुरातनं
स्थितं जलादर्श इवांशुमालिनम् ॥
सारांश AI पन्ने के समान श्यामवर्ण और तेजस्वी शरीर वाले अर्जुन मनुष्य रूप में स्थित उन आदिपुरुष के समान सुशोभित हो रहे थे, जैसे जल रूपी दर्पण में सूर्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
१४.४२
गुरुक्रियारम्भफलैरलंकृतं
गतिं प्रतापस्य जगत्प्रमाथिनः ।
गणाः समासेदुरनीलवाजिनं
तपात्यये तोयघना घना इव ॥
सारांश AI अपनी महान क्रियाओं के फल से अलंकृत और शत्रुओं का संहार करने वाले अर्जुन के पास शिव के गण उसी प्रकार पहुँचे, जैसे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति पर काले मेघ आकाश में उमड़ते हैं।
१४.४३
यथास्वमाशंसितविक्रमाः पुरा
मुनिप्रभावक्षततेजसः परे ।
ययुः क्षणादप्रतिपत्तिमूढतां
महानुभावः प्रतिहन्ति पौरुषम् ॥
सारांश AI पहले अपनी वीरता का बखान करने वाले वे गण मुनि अर्जुन के प्रभाव से तेजहीन होकर क्षण भर में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए; वास्तव में महानुभावों का तेज दूसरों के पुरुषार्थ को दबा देता है।
१४.४४
ततः प्रजह्रे सममेव तत्र
तैरपेक्षितान्योन्यबलोपपत्तिभ्-
इः महोदयानामपि संघवृत्तित्-
आं सहायसाध्याः प्रदिशन्ति सिद्धय्-
अः
सारांश AI इसके बाद वे गण एक-दूसरे के बल की सहायता लेते हुए साथ मिलकर अर्जुन पर टूट पड़े; महान कार्यों में सफलता अक्सर समूह के सहयोग से ही सिद्ध होती है।
१४.४५
किरातसैन्यादुरुचापनोदिताः
समं समुत्पेतुरुपात्तरंहसः ।
महावनादुन्मनसः खगा इव
प्रवृत्तपत्त्रध्वनयः शिलीमुखाः ॥
सारांश AI किरात सेना के धनुषों से छोड़े गए बाण पंखों की फड़फड़ाहट करते हुए तीव्र गति से एक साथ ऊपर उठे, जैसे घने वन से व्याकुल होकर पक्षी अचानक उड़ान भरते हैं।
१४.४६
गभीररन्ध्रेषु भृशं महीभृतः
प्रतिस्वनैरुन्नमितेन सानुषु ।
धनुर्निनादेन जवादुपेयुषा
विभिद्यमाना इव दध्वनुर्दिशः ॥
सारांश AI पर्वतों की गुफाओं में गूँजती हुई और चोटियों तक पहुँचती हुई धनुष की वह भीषण टंकार दिशाओं को विदीर्ण करती हुई प्रतीत हो रही थी।
१४.४७
विधूनयन्ती गहनानि भूरुहां
तिरोहितोपान्तनभोदिगन्तरा ।
महीयसी वृष्टिरिवानिलेरिता
रवं वितेने गणमार्गणावलिः ॥
सारांश AI गणों द्वारा छोड़ी गई बाणों की वह विशाल पंक्ति आकाश और दिशाओं को ओझल करती हुई तथा वृक्षों को झकझोरती हुई वायु से प्रेरित वर्षा के समान फैल गई।
१४.४८
त्रयीम् ऋतूनामनिलाशिनः सतः
प्रयाति पोषं वपुषि प्रहृष्यतः ।
रणाय जिष्णोर्विदुषेव सत्वरं
घनत्वमीये शिथिलेन वर्मणा ॥
सारांश AI युद्ध के लिए उत्साहित अर्जुन का शरीर जैसे ही पुलकित हुआ, उनका ढीला कवच उनके शरीर पर उसी प्रकार कस गया जैसे वह युद्ध की सूचना पाकर स्वयं सचेत हो गया हो।
१४.४९
पतत्सु शस्त्रेषु वितत्य रोदसी
समन्ततस्तस्य धनुर्दुधूषतः ।
सरोषमुल्केव पपात भीषणा
बलेषु दृष्टिर्विनिपातशंसिनी ॥
सारांश AI शस्त्रों की वर्षा के बीच जब अर्जुन ने अपना धनुष संभाला, तब उनकी क्रोधपूर्ण दृष्टि सेना पर किसी विनाशकारी उल्का के समान गिरी, जो सर्वनाश का संकेत दे रही थी।
१४.५०
दिशः समूहन्निव विक्षिपन्निव
प्रभां रवेराकुलयन्निवानिलम् ।
मुनिश्चचाल क्षयकालदारुणः
क्षितिं सशैलां चलयन्निवेषुभिः ॥
सारांश AI प्रलयकाल के समान भयंकर वे मुनि अर्जुन अपने बाणों से पर्वतों सहित पृथ्वी को हिलाते हुए और सूर्य की प्रभा को मन्द करते हुए युद्धभूमि में विचरने लगे।
॥ इति चतुर्दशः सर्गः ॥
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