अन्वयः
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भूयसा निजेन धैर्यगुणेन विजितान्यगौरवं गभीरतां नीतं, घनोरुवीरुधा वनोदयेन समन्धकारीकृतम् उत्तमाचलम् इव (तं ददृशुः)।
English Summary
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They saw him, who had been led to a profound depth that surpassed all other gravitas by his own abundant virtue of courage. He was like a great mountain made dark and dense by an overgrowth of thick, large creepers.
सारांश
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अपने अगाध धैर्य से दूसरों के मान को क्षीण करने वाले अर्जुन घनी वनस्पतियों से युक्त किसी विशाल और गंभीर पर्वत के समान प्रतीत हो रहे थे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
निजेनेति॥पुनश्च।निजेन नैसर्गिकेण भूयसा बहुलेन धैर्यमेव गुणस्तेन विजितमन्येषां गौरवं गाम्भीर्यं यस्मिन्कर्मणि तथा गभीरतां दुरवगाहत्वं नीतम् । अत एव घनाः सान्द्रा उरवश्च महत्यो वीरुधो लताश्च यस्मिम्स्तेन घनोर्रुवीरुधा वनोदयेनारण्यप्रादुर्भावेन समन्धकारीकृतं दुरवगाहीकृतमुत्तमाचलमिव स्थितम् । समन्ततोऽन्धकारो यस्य स इति विग्रहः ॥
पदच्छेदः
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| निजेन | निज (३.१) | by his own |
| नीतम् | नीत (√नी+क्त, २.१) | led |
| विजितान्यगौरवम् | विजित (वि√जि+क्त)–अन्य–गौरव (२.१) | which surpassed the gravitas of others |
| गभीरताम् | गभीरता (२.१) | to profundity |
| धैर्यगुणेन | धैर्य–गुण (३.१) | by the virtue of courage |
| भूयसा | भूयस् (३.१) | abundant |
| वनोदयेन | वन–उदय (३.१) | by an overgrowth of forest |
| इव | इव | like |
| घनोरुवीरुधा | घन–उरु–वीरुध् (३.१) | with thick and large creepers |
| समन्धकारीकृतम् | समन्धकारीकृत (सम्√अन्धकार+च्वि+कृ+क्त, २.१) | made completely dark |
| उत्तमाचलम् | उत्तम–अचल (२.१) | a great mountain |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | जे | न | नी | तं | वि | जि | ता | न्य | गौ | र | वं |
| ग | भी | र | तां | धै | र्य | गु | णे | न | भू | य | सा |
| व | नो | द | ये | ने | व | घ | नो | रु | वी | रु | धा |
| स | म | न्ध | का | री | कृ | त | मु | त्त | मा | च | लम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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