मृगान्विनिघ्नन्मृगयुः स्वहेतुना
कृतोपकारः कथमिच्छतां तपः ।
कृपेति चेदस्तु मृगः क्षतः क्षणा-
दनेन पूर्वं न मयेति का गतिः ॥
मृगान्विनिघ्नन्मृगयुः स्वहेतुना
कृतोपकारः कथमिच्छतां तपः ।
कृपेति चेदस्तु मृगः क्षतः क्षणा-
दनेन पूर्वं न मयेति का गतिः ॥
कृतोपकारः कथमिच्छतां तपः ।
कृपेति चेदस्तु मृगः क्षतः क्षणा-
दनेन पूर्वं न मयेति का गतिः ॥
अन्वयः
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स्वहेतुना मृगान् विनिघ्नन् मृगयुः तपः इच्छताम् कथम् कृत-उपकारः (भवति)? कृपा इति चेत्, अस्तु । मृगः अनेन पूर्वम् क्षतः, मया न, इति (विषये) का गतिः?
English Summary
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"How can a hunter, killing animals for his own purpose, be considered a benefactor to those desiring penance? If you say it was out of compassion, so be it. But what is the solution to this: the boar was wounded by this man first, not by me?"
सारांश
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स्वार्थ के लिए मृगों को मारने वाला शिकारी तपस्वियों का उपकारी कैसे हो सकता है? यदि दया की बात है, तो यह कहना व्यर्थ है कि मृग को पहले उसने मारा, मैंने नहीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मृगानिति ॥ स्वमात्मैव हेतुस्तेन स्वहेतुना । स्वार्थमित्यर्थः ।
सर्वनाम्नस्तृतीया च (अष्टाध्यायी २.३.२७ ) इति तृतीया । मृगान्विनिघ्नन्प्रहरन् । मृगान्यातीति मृगयुर्व्याध:। मृगयुर्व्याधश्च इत्यौणादिको युप्रत्ययान्तो निपातः । व्याधो मृगवधाजीवी मृगयुर्लुब्धकोऽपि सः इत्यमरः (अमरकोशः २.१०.२१ ) । तप इच्छतां तपस्विनां कथं कृतोपकारः । न कथंचिदित्यर्थः । अथ कृपेति चेत् । व्याधस्यापीति शेषः । अस्तु । किं शुष्ककलहेनेति भावः। परंतु यदुक्तम् निघ्नतः परनिवर्हितम् इत्यादिना तस्य प्रथमप्रहर्तृत्वं तदयुक्तमित्याह-मृगःक्षणात्क्षतः। आवाभ्यां युगपदेव विद्ध इत्यर्थः । एवं सत्यनेन नृपेणैव पूर्वं हतो मया तु नेत्यत्र का गतिः किं प्रमाणम् ।पौर्वापर्यस्य दुर्लक्ष्यत्वादिति भावः। तथा च यदुक्तम् व्रीडितव्यम् इत्युपालम्भस्तस्यैव किं न स्यादिति भावः ॥ पूर्व कृपेति चेदस्तु इत्युक्तम् । संप्रति तदप्यसहमान आह
पदच्छेदः
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| मृगान् | मृग (२.३) | animals |
| विनिघ्नन् | विनिघ्नत् (वि+नि√हन्+शतृ, १.१) | killing |
| मृगयुः | मृगयु (१.१) | a hunter |
| स्वहेतुना | स्व–हेतु (३.१) | for his own purpose |
| कृतोपकारः | कृत–उपकार (१.१) | a benefactor |
| कथम् | कथम् | how |
| इच्छताम् | इच्छत् (√इष्+शतृ, ६.३) | of those desiring |
| तपः | तपस् (२.१) | penance |
| कृपा | कृपा (१.१) | compassion |
| इति | इति | if you say |
| चेत् | चेत् | if |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | so be it |
| मृगः | मृग (१.१) | the boar |
| क्षतः | क्षत (√क्षन्+क्त, १.१) | was wounded |
| क्षणात् | क्षण (५.१) | a moment |
| अनेन | इदम् (३.१) | by this man |
| पूर्वम् | पूर्वम् | first |
| न | न | not |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| इति | इति | in this matter |
| का | किम् (१.१) | what |
| गतिः | गति (१.१) | is the solution |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृ | गा | न्वि | नि | घ्न | न्मृ | ग | युः | स्व | हे | तु | ना |
| कृ | तो | प | का | रः | क | थ | मि | च्छ | तां | त | पः |
| कृ | पे | ति | चे | द | स्तु | मृ | गः | क्ष | तः | क्ष | णा |
| द | ने | न | पू | र्वं | न | म | ये | ति | का | ग | तिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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