सखा स युक्तः कथितः कथं त्वया
यदृच्छयासूयति यस्तपस्यते ।
गुणार्जनोच्छ्रायविरुद्धबुद्धयः
प्रकृत्यमित्रा हि सतामसाधवः ॥
सखा स युक्तः कथितः कथं त्वया
यदृच्छयासूयति यस्तपस्यते ।
गुणार्जनोच्छ्रायविरुद्धबुद्धयः
प्रकृत्यमित्रा हि सतामसाधवः ॥
यदृच्छयासूयति यस्तपस्यते ।
गुणार्जनोच्छ्रायविरुद्धबुद्धयः
प्रकृत्यमित्रा हि सतामसाधवः ॥
अन्वयः
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यः तपस्यते यदृच्छया असूयति, सः त्वया कथम् युक्तः सखा कथितः? हि गुण-अर्जन-उच्छ्राय-विरुद्ध-बुद्धयः असाधवः प्रकृत्या सताम् अमित्राः (भवन्ति) ।
English Summary
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"How can you call him a suitable friend, who without reason is envious of one engaged in penance? Indeed, the wicked, whose minds are opposed to the acquisition and growth of virtues, are by nature enemies of the good."
सारांश
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वह कैसा मित्र जो ईर्ष्यावश तपस्या में विघ्न डाले? दुर्जन स्वाभाविक रूप से सज्जनों के शत्रु होते हैं क्योंकि उनकी बुद्धि गुणों की वृद्धि के विपरीत होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सखेति ॥ स नृपः कथं त्वया युक्तो योग्यः सखा कथितः । न कथंचित्कथनीय इत्यर्थः।कुतः। यो नृपस्तपस्यते तपश्चरते । अनपराधिन इत्यर्थः।
क्रुधद्रुह- (अष्टाध्यायी १.४.३७ ) इत्यादिना संप्रदानत्वाच्चतुर्थी । यदृच्छया स्वैरवृत्त्या । यदृच्छा स्वैरिता इत्यमरः (अमरकोशः ३.२.२ ) । अस्यत्यसूयां करोति । असूया तु दोषारोपो गुणेष्वपि इत्यमरः (अमरकोशः १.७.२६ ) । प्रत्युत शत्रुरेवायमित्याह-हि यस्माद्गुणानामर्जने य उच्छ्राय उत्कर्षस्तस्य विरुद्धा विमुखा बुद्धिर्येषां ते तथा साधवो दुष्टाः सतां सज्जनानां प्रकृत्यमित्राः प्रकृत्या शत्रवः द्विड्विपक्षाहितामित्रदस्युशात्रवशत्रवः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.११ ) ॥ हीनजातिवृत्तित्वात्सख्यानर्हः स इत्याह
पदच्छेदः
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| सखा | सखि (१.१) | a friend |
| सः | तद् (१.१) | he |
| युक्तः | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | suitable |
| कथितः | कथित (√कथ्+क्त, १.१) | is called |
| कथम् | कथम् | how |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| यदृच्छया | यदृच्छा (३.१) | without reason |
| असूयति | असूयति (√असूय् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is envious |
| यः | यद् (१.१) | who |
| तपस्यते | तपस्यते (√तपस् +क्यच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | of one engaged in penance |
| गुणार्जनोच्छ्रायविरुद्धबुद्धयः | गुण–अर्जन–उच्छ्राय–विरुद्ध–बुद्धि (१.३) | whose minds are opposed to the acquisition and growth of virtues |
| प्रकृत्या | प्रकृति (३.१) | by nature |
| अमित्राः | अमित्र (१.३) | enemies |
| हि | हि | indeed |
| सताम् | सत् (√अस्+शतृ, ६.३) | of the good |
| असाधवः | असाधु (१.३) | the wicked |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | खा | स | यु | क्तः | क | थि | तः | क | थं | त्व | या |
| य | दृ | च्छ | या | सू | य | ति | य | स्त | प | स्य | ते |
| गु | णा | र्ज | नो | च्छ्रा | य | वि | रु | द्ध | बु | द्ध | यः |
| प्र | कृ | त्य | मि | त्रा | हि | स | ता | म | सा | ध | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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