निशातरौद्रेषु विकासतां गतैः
प्रदीपयद्भिः ककुभामिवान्तरम् ।
वनेसदां हेतिषु भिन्नविग्रहै-
र्विपुस्फुरे रश्मिमतो मरीचिभिः ॥
निशातरौद्रेषु विकासतां गतैः
प्रदीपयद्भिः ककुभामिवान्तरम् ।
वनेसदां हेतिषु भिन्नविग्रहै-
र्विपुस्फुरे रश्मिमतो मरीचिभिः ॥
प्रदीपयद्भिः ककुभामिवान्तरम् ।
वनेसदां हेतिषु भिन्नविग्रहै-
र्विपुस्फुरे रश्मिमतो मरीचिभिः ॥
अन्वयः
AI
(तस्य तेजः) निशातरौद्रेषु वनेसदाम् हेतिषु भिन्नविग्रहैः विकासतां गतैः ककुभाम् अन्तरम् इव प्रदीपयद्भिः रश्मिमतः मरीचिभिः (इव) विपुस्फुरे।
English Summary
AI
Arjuna's radiance, like the rays of the sun, shone brightly. Reflected and scattered from the sharp, fearsome weapons of the forest-dwellers, his rays spread out, seeming to illuminate the entire space between the cardinal directions.
सारांश
AI
वनवासियों के चमकते हुए शस्त्र सूर्य की किरणों को परावर्तित कर दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे, मानो वन में दीपों की पंक्ति जल रही हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
निशातेति ॥ निशातास्तीक्ष्णा अतएव रौद्रा भीषणांश्च ये तेषु निशातरौद्रेषु । विशेष्यविशेषणयोरन्यतरविशेष्यत्वविवक्षायामिष्टत्वाद्विशेषणसमासः । वने सीदन्तीति वनेसदां वनेचराणाम् ।
सत्सूद्विष- (अष्टाध्यायी ३.२.६१ ) इत्यादिना क्विप् । तत्पुरुषे कृति बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इत्यलुक् । हेतिष्वायुधेषु।हेतिः शस्त्रेऽपि पुंस्त्रियोः इति केशवः । भिन्नविग्रहै: संक्रान्तमूर्तिभिरतं एव विकासतां विसृत्वरतां गतैरत एव ककुभां दिशामन्तरमवकाशं प्रदीपयद्भिः प्रज्वालयद्भिरिव स्थितैरित्युत्प्रेक्षा । रश्मिमतः सूर्यस्य । मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः (अष्टाध्यायी ८.२.९ ) इति मतुपो मकारस्य न वकारः। मरीचिभिः करैः । भानुः करोमरीचिः स्त्रीपुंसयोः इत्यमरः (अमरकोशः १.३.३७ ) । विपुस्फुरे बभासे । स्फुरतेर्भावे लिट् ॥
पदच्छेदः
AI
| निशातरौद्रेषु | निशात–रौद्र (७.३) | in the sharpened and terrible |
| विकासतां | विकासता (२.१) | expansion |
| गतैः | गत (√गम्+क्त, ३.३) | by those that had gone to |
| प्रदीपयद्भिः | प्रदीपयत् (प्र√दीप्+णिच्+शतृ, ३.३) | by those illuminating |
| ककुभाम् | ककुभ् (६.३) | of the directions |
| इव | इव | as if |
| अन्तरम् | अन्तर (२.१) | the space between |
| वनेसदाम् | वनेसद् (६.३) | of the forest-dwellers |
| हेतिषु | हेति (७.३) | on the weapons |
| भिन्नविग्रहैः | भिन्न (√भिद्+क्त)–विग्रह (३.३) | by those with shattered forms |
| विपुस्फुरे | विपुस्फुरे (वि√स्फुर् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone brightly |
| रश्मिमतः | रश्मिमत् (६.१) | of the sun |
| मरीचिभिः | मरीचि (३.३) | with rays |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | शा | त | रौ | द्रे | षु | वि | का | स | तां | ग | तैः |
| प्र | दी | प | य | द्भिः | क | कु | भा | मि | वा | न्त | रम् |
| व | ने | स | दां | हे | ति | षु | भि | न्न | वि | ग्र | है |
| र्वि | पु | स्फु | रे | र | श्मि | म | तो | म | री | चि | भिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.