गुणापवादेन तदन्यरोपणा-
द्भृशाधिरूढस्य समञ्जसं जनम् ।
द्विधेव कृत्वा हृदयं निगूहतः
स्फुरदसाधोर्विवृणोति वागसिः ॥
गुणापवादेन तदन्यरोपणा-
द्भृशाधिरूढस्य समञ्जसं जनम् ।
द्विधेव कृत्वा हृदयं निगूहतः
स्फुरदसाधोर्विवृणोति वागसिः ॥
द्भृशाधिरूढस्य समञ्जसं जनम् ।
द्विधेव कृत्वा हृदयं निगूहतः
स्फुरदसाधोर्विवृणोति वागसिः ॥
अन्वयः
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वाक्-असिः गुण-अपवादेन तत्-अन्य-रोपणात् च हृदयम् द्विधा इव कृत्वा समञ्जसम् जनम् निगूहतः भृश-अधिरूढस्य स्फुरत्-असाधोः (भावम्) विवृणोति ।
English Summary
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"The sword of speech, by denying virtues and imputing other faults, reveals the manifest wickedness of one who, having deeply wronged an honest person, tries to conceal his feelings, as if splitting the heart in two."
सारांश
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दुर्जन व्यक्ति के हृदय के कपट और गुणों के प्रति द्वेष को उसकी वाणी ही प्रकट कर देती है, जो सज्जन व्यक्ति के हृदय को आहत करने वाली तलवार के समान होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
गुणेति । गुणापवादेन विद्यमानगुणापह्नवेन तदन्यरोपणात्तस्माद्गुणादन्यस्य दोषस्याविद्यमानस्यैवारोपणाच्च समञ्जसं जनं सुजनं भृशाधिरूढस्यातिमात्रमाक्रम्य स्थितस्य अभिक्षिप्तस्येत्यर्थः । कर्तरि क्तः। निगृहतो हृदयं संवृण्वतोऽप्यसाधोरनार्यस्य हृदयं कर्म स्फुरन्विलसन्वागेवासिर्द्धिधा कृत्वा भित्त्वेव विवृणोति । अतिदुष्टया वाचैवैतत्पूर्विकाया बुद्धेरपि दौष्टयमनुमीयत इति भावः । वागसिरित्यत्र रूपकं द्विधाकरणरूपकसाधकम् ॥ यदुक्तम्
अभ्यधानि इति, तत्रोत्तरमाह້
पदच्छेदः
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| गुणापवादेन | गुण–अपवाद (३.१) | by denying virtues |
| तदन्यरोपणात् | तद्–अन्य–रोपण (५.१) | and by imputing other faults |
| भृशाधिरूढस्य | भृश–अधिरूढ (६.१) | of one who has deeply wronged |
| समञ्जसम् | समञ्जस (२.१) | an honest |
| जनम् | जन (२.१) | person |
| द्विधा | द्विधा | in two |
| इव | इव | as if |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having made |
| हृदयम् | हृदय (२.१) | the heart |
| निगूहतः | निगूहत् (नि√गुह्+शतृ, ६.१) | of one who tries to conceal |
| स्फुरदसाधोः | स्फुरत्–असाधु (६.१) | of the manifest wickedness |
| विवृणोति | विवृणोति (वि√वृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reveals |
| वागसिः | वाच्–असि (१.१) | the sword of speech |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गु | णा | प | वा | दे | न | त | द | न्य | रो | प | णा |
| द्भृ | शा | धि | रू | ढ | स्य | स | म | ञ्ज | सं | ज | नम् |
| द्वि | धे | व | कृ | त्वा | हृ | द | यं | नि | गू | ह | तः |
| स्फु | र | द | सा | धो | र्वि | वृ | णो | ति | वा | ग | सिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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