न वर्त्म कस्मैचिदपि प्रदीयता-
मिति व्रतं मे विहितं महर्षिणा ।
जिघांसुरस्मान्निहतो मया मृगो
व्रताभिरक्षा हि सतामलंक्रिया ॥

सारांश AI 'किसी को मार्ग न दो' ऐसा व्रत मुझे महर्षि ने दिया है। मुझ पर आक्रमण करने की इच्छा रखने वाले मृग को मैंने मारा है, क्योंकि अपने व्रत की रक्षा करना ही सज्जनों का आभूषण है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) नेति ॥ कस्मैचिदपि वर्त्म न प्रदीयतामित्येवं व्रतं महर्षिणा व्यासेन मे मह्यं विहितम्। उपदिष्टमित्यर्थः। अस्मात्कारणाज्जिघांसुर्हन्तुमिच्छुरापतन्नभिधावन्नयं मृगो मया निहतः । हि यस्माद्व्रताभिरक्षा सतामलंक्रिया । न तु दोषः । अत आत्मरक्षणार्थमस्य वधः। न निष्कारणमित्यर्थः॥ दुर्वचं तत् इत्यादिना यत्संजातं बन्धुत्वमुक्तं तत्राचष्टे
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
र्त्म स्मै चि पि प्र दी ता
मि ति व्र तं मे वि हि तं र्षि णा
जि घां सु स्मा न्नि तो या मृ गो
व्र ता भि क्षा हि ता लं क्रि या
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