वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणोचिताः
क्व जातिहीना मृगजीवितच्छिदः ।
सहापकृष्टैर्महतां न संगतं
भवन्ति गोमायुसखा न दन्तिनः ॥
वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणोचिताः
क्व जातिहीना मृगजीवितच्छिदः ।
सहापकृष्टैर्महतां न संगतं
भवन्ति गोमायुसखा न दन्तिनः ॥
क्व जातिहीना मृगजीवितच्छिदः ।
सहापकृष्टैर्महतां न संगतं
भवन्ति गोमायुसखा न दन्तिनः ॥
अन्वयः
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वर्ण-आश्रम-रक्षण-उचिताः वयम् क्व, जाति-हीनाः मृग-जीवित-च्छिदः (यूयम्) क्व । महताम् अपकृष्टैः सह संगतम् न (भवति) । दन्तिनः गोमायु-सखाः न भवन्ति ।
English Summary
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"Where are we, fit to protect the social and religious orders, and where are you, low-born destroyers of animal life? Association of the great with the lowly is not proper. Elephants are not friends with jackals."
सारांश
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हम वनवासी शिकारी और तुम वर्णाश्रम के रक्षक; हमारा मेल असंभव है। श्रेष्ठ जन नीचों का साथ नहीं देते, जैसे हाथी सियारों से मित्रता नहीं करते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वयमिति ॥ वर्णाश्रमरक्षणोचिता विशुद्धवृत्तयो वयं राजानः क्व । जातिहीना मृगजीवितच्छिदो हिंसाजीविनो व्याधाः क्व । फलितमाह-अपकृष्टैरुक्तरीत्या जात्या वृत्त्या च निकृष्टैः सह महतां ताभ्यामेवोत्कृष्टानां संगतं सख्यं न । घटत इति शेषः । तथा हि । दन्तिनो गजा गोमायूनां शृगालानां सखायो गोमायुसखा न भवन्ति ।
स्त्रियां शिवा भूरिमायगोमायुमृगधूर्तकाः । शृगालवञ्चकक्रोष्टुफेरुफेरवजम्बुकाः॥ इत्यमरः (अमरकोशः २.५.६ ) । अत्र विशेषेण सामान्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः॥ नीचसख्यं कथमधिक्षिप्यत इति चेत्तत्राह
पदच्छेदः
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| वयम् | अस्मद् (१.३) | we |
| क्व | क्व | where |
| वर्णाश्रमरक्षणोचिताः | वर्ण–आश्रम–रक्षण–उचित (१.३) | are fit to protect the social and religious orders |
| क्व | क्व | and where |
| जातिहीनाः | जाति–हीन (१.३) | are you, low-born |
| मृगजीवितच्छिदः | मृग–जीवित–छिद् (१.३) | destroyers of animal life |
| सह | सह | with |
| अपकृष्टैः | अपकृष्ट (अप√कृष्+क्त, ३.३) | the lowly |
| महताम् | महत् (६.३) | of the great |
| न | न | not |
| संगतम् | संगत (सम्√गम्+क्त, १.१) | association is proper |
| भवन्ति | भवन्ति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are |
| गोमायुसखाः | गोमायु–सखि (१.३) | friends with jackals |
| न | न | not |
| दन्तिनः | दन्तिन् (१.३) | elephants |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | यं | क्व | व | र्णा | श्र | म | र | क्ष | णो | चि | ताः |
| क्व | जा | ति | ही | ना | मृ | ग | जी | वि | त | च्छि | दः |
| स | हा | प | कृ | ष्टै | र्म | ह | तां | न | सं | ग | तं |
| भ | व | न्ति | गो | मा | यु | स | खा | न | द | न्ति | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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