मया मृगान्हन्तुरनेन हेतुना
विरुद्धमाक्षेपवचस्तितिक्षितम् ।
शरार्थमेष्यत्यथ लप्स्यते गतिं
शिरोमणिं दृष्टिविषाज्जिघृक्षतः ॥
मया मृगान्हन्तुरनेन हेतुना
विरुद्धमाक्षेपवचस्तितिक्षितम् ।
शरार्थमेष्यत्यथ लप्स्यते गतिं
शिरोमणिं दृष्टिविषाज्जिघृक्षतः ॥
विरुद्धमाक्षेपवचस्तितिक्षितम् ।
शरार्थमेष्यत्यथ लप्स्यते गतिं
शिरोमणिं दृष्टिविषाज्जिघृक्षतः ॥
अन्वयः
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मृगान् हन्तुः (तव) अनेन हेतुना विरुद्धम् आक्षेप-वचः मया तितिक्षितम् । अथ शरार्थम् एष्यति (भवान्) दृष्टिविषात् शिरोमणिम् जिघृक्षतः गतिम् लप्स्यते ।
English Summary
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"For this reason, I have tolerated the hostile, reproachful words of you, the hunter of beasts. Now, coming for the arrow, you will meet the same fate as one who tries to snatch a crest-jewel from a venomous serpent."
सारांश
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मृग वध के कारण मैंने इसके कटु वचन सहे, किंतु अब बाण के लिए आने पर इसकी वही गति होगी जो सर्प की मणि छीनने वाले की होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मयेति ॥ अनेन हेतुना संधिविग्रहानर्हत्वेन कारणेन मया मृगान्हन्तुर्व्याधस्य संबन्धि। हन्तेस्तन्प्रत्ययः । अतएव
न लोक- (अष्टाध्यायी २.३.६९ ) इत्यादिना षष्ठीप्रतिषेधः। विरुद्धमतिपरुषमाक्षेपवचस्तिरस्कारवचनं तितिक्षितं सोढम् । ननु सख्यानङ्गीकारे बलाच्छरं ग्रहीष्यतीत्याशंक्याह-शरेति । अथ शरार्थमेष्यति दृष्टौ विषं यस्य तस्माद्दृष्टिविषात्सर्पविशेषाच्छिरोमणिं जिघृक्षतो ग्रहीतुमिच्छतो गतिं दशां लप्स्यते प्राप्स्यति ॥
पदच्छेदः
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| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| मृगान् | मृग (२.३) | of beasts |
| हन्तुः | हन्तृ (√हन्+तृच्, ६.१) | of you, the hunter |
| अनेन | इदम् (३.१) | this |
| हेतुना | हेतु (३.१) | for reason |
| विरुद्धम् | विरुद्ध (१.१) | hostile |
| आक्षेपवचः | आक्षेप–वचस् (१.१) | reproachful words |
| तितिक्षितम् | तितिक्षित (√तिज्+सन्+क्त, १.१) | have been tolerated |
| शरार्थम् | शर–अर्थम् | for the arrow |
| एष्यति | एष्यति (√इ कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | coming |
| अथ | अथ | now |
| लप्स्यते | लप्स्यते (√लभ् कर्तरि लृट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | you will meet |
| गतिम् | गति (२.१) | the fate |
| शिरोमणिम् | शिरस्–मणि (२.१) | a crest-jewel |
| दृष्टिविषात् | दृष्टि–विष (५.१) | from a venomous serpent |
| जिघृक्षतः | जिघृक्षत् (√ग्रह्+सन्+शतृ, ६.१) | of one who tries to snatch |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | या | मृ | गा | न्ह | न्तु | र | ने | न | हे | तु | ना |
| वि | रु | द्ध | मा | क्षे | प | व | च | स्ति | ति | क्षि | तम् |
| श | रा | र्थ | मे | ष्य | त्य | थ | ल | प्स्य | ते | ग | तिं |
| शि | रो | म | णिं | दृ | ष्टि | वि | षा | ज्जि | घृ | क्ष | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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