१२.१
अथ वासवस्य वचनेन
रुचिरवदनस्त्रिलोचनम् ।
क्लान्तिरहितमभिराधयितुं
विधिवत्तपांसि विदधे धनंजयः ॥
रुचिरवदनस्त्रिलोचनम् ।
क्लान्तिरहितमभिराधयितुं
विधिवत्तपांसि विदधे धनंजयः ॥
सारांश
AI
इंद्र के आदेश पर अर्जुन ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विधिपूर्वक कठिन तपस्या प्रारंभ की।
१२.२
अभिरश्मिमालि विमलस्य
धृतजयधृतेरनाशुषः ।
तस्य भुवि बहुतिथास्तिथयः
प्रतिजग्मुरेकचरणं निषीदतः ॥
धृतजयधृतेरनाशुषः ।
तस्य भुवि बहुतिथास्तिथयः
प्रतिजग्मुरेकचरणं निषीदतः ॥
सारांश
AI
सूर्योन्मुख होकर और एक पैर पर खड़े होकर निराहार अर्जुन ने तपस्या में अनेक दिन व्यतीत किए।
१२.३
वपुरिन्द्रियोपतपनेषु
सततमसुखेषु पाण्डवः ।
व्याप नगपतिरिव स्थिरतां
महतां हि धैर्यमविभाव्यवैभवम् ॥
सततमसुखेषु पाण्डवः ।
व्याप नगपतिरिव स्थिरतां
महतां हि धैर्यमविभाव्यवैभवम् ॥
सारांश
AI
इंद्रियों को कष्ट देने वाली स्थितियों में भी अर्जुन पर्वत के समान अडिग रहे, क्योंकि महापुरुषों का धैर्य असीम होता है।
१२.४
न पपात संनिहितपक्तिसुरभिषु फलेषु मानसम् । तस्य शुचिनि शिशिरे च पयस्यमृतायते हि सुतपः सुकर्मणाम् ॥
सारांश
AI
अर्जुन का मन निकट उपलब्ध फलों की ओर नहीं भटका। पवित्र शीतल जल उनके लिए अमृत के समान सुखकारी हो गया।
१२.५
न विसिस्मिये न विषसाद
मुहुरलसतां नु चाददे ।
सत्त्वमुरुधृति रजस्तमसी
न हतः स्म तस्य हतशक्तिपेलवे ॥
मुहुरलसतां नु चाददे ।
सत्त्वमुरुधृति रजस्तमसी
न हतः स्म तस्य हतशक्तिपेलवे ॥
सारांश
AI
अर्जुन न विचलित हुए और न ही उनमें आलस्य आया। उनके प्रबल सत्त्व गुण ने रज और तम को परास्त कर दिया।
१२.६
तपसा कृशं वपुरुवाह
स विजितजगत्त्रयोदयम् ।
त्रासजननमपि तत्त्वविदां
किमिवास्ति यन्न सुकरं मनस्विभिः ॥
स विजितजगत्त्रयोदयम् ।
त्रासजननमपि तत्त्वविदां
किमिवास्ति यन्न सुकरं मनस्विभिः ॥
सारांश
AI
तप से दुर्बल शरीर होने पर भी अर्जुन अत्यंत ओजस्वी थे। दृढ़निश्चयी महापुरुषों के लिए संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है।
१२.७
ज्वलतोऽनलादनुनिशीथ-
मधिकरुचिरम्भसां निधेः ।
धैर्यगुणमवजयन्विजयी
ददृशे समुन्नततरः स शैलतः ॥
मधिकरुचिरम्भसां निधेः ।
धैर्यगुणमवजयन्विजयी
ददृशे समुन्नततरः स शैलतः ॥
सारांश
AI
अग्नि और चंद्रमा से भी अधिक दीप्तिमान अर्जुन अपने धैर्य के कारण हिमालय पर्वत से भी ऊंचे और महान प्रतीत हो रहे थे।
१२.८
जपतः सदा जपमुपांशु
वदनमभितो विसारिभिः ।
तस्य दशनकिरणैः शुशुभे
परिवेषभीषणमिवार्कमण्डलम् ॥
वदनमभितो विसारिभिः ।
तस्य दशनकिरणैः शुशुभे
परिवेषभीषणमिवार्कमण्डलम् ॥
सारांश
AI
मौन जप करते हुए अर्जुन के मुख से निकलती दंत-किरणें उन्हें प्रभामंडल युक्त सूर्य के समान तेजस्वी बना रही थीं।
१२.९
कवचं स बिभ्रदुपवीत-
पदनिहितसज्यकार्मुकः ।
शैलपतिरिव महेन्द्रधनुः-
परिवीतभीमगहनो विदिद्युते ॥
पदनिहितसज्यकार्मुकः ।
शैलपतिरिव महेन्द्रधनुः-
परिवीतभीमगहनो विदिद्युते ॥
सारांश
AI
कवच और धनुष धारण किए हुए अर्जुन वैसे ही सुशोभित हुए जैसे इंद्रधनुष से घिरा हुआ कोई विशाल पर्वत।
१२.१०
प्रविवेश गामिव कृशस्य
नियमसवनाय गच्छतः ।
तस्य पदविनमितो हिमवा-
न्गुरुतां नयन्ति हि गुणा न संहतिः ॥
नियमसवनाय गच्छतः ।
तस्य पदविनमितो हिमवा-
न्गुरुतां नयन्ति हि गुणा न संहतिः ॥
सारांश
AI
अर्जुन के चरणों के भार से हिमालय झुक गया। वास्तव में महानता गुणों से आती है, केवल शरीर की विशालता से नहीं।
१२.११
परिकीर्णमुद्यतभुजस्य
भुवनविवरे दुरासदम् ।
ज्योतिरुपरि शिरसो विततं
जगृहे निजान्मुनिदिवौकसां पथः ॥
भुवनविवरे दुरासदम् ।
ज्योतिरुपरि शिरसो विततं
जगृहे निजान्मुनिदिवौकसां पथः ॥
सारांश
AI
अर्जुन के मस्तक से निकले तीव्र प्रकाश ने संपूर्ण आकाश को व्याप्त कर लिया और देवताओं के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
१२.१२
रजनीषु राजतनयस्य
बहुलसमयेऽपि धामभिः ।
भिन्नतिमिरनिकरं न जहे
शशिरश्मिसंगमयुजा नभः श्रिया ॥
बहुलसमयेऽपि धामभिः ।
भिन्नतिमिरनिकरं न जहे
शशिरश्मिसंगमयुजा नभः श्रिया ॥
सारांश
AI
अंधेरी रातों में भी अर्जुन के तेज ने आकाश को चंद्रमा की किरणों जैसी आभा से निरंतर प्रकाशित रखा।
१२.१३
महता मयूखनिचयेन
शमितरुचि जिष्णुजन्मना ।
ह्रीतमिव नभसि वीतमले
न विराजते स्म वपुरंशुमालिनः ॥
शमितरुचि जिष्णुजन्मना ।
ह्रीतमिव नभसि वीतमले
न विराजते स्म वपुरंशुमालिनः ॥
सारांश
AI
अर्जुन की किरणों के पुंज के सामने सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ गया और वह आकाश में लज्जित सा दिखने लगा।
१२.१४
तमुदीरितारुणजटांशु-
मधिगुणशरासनं जनाः ।
रुद्रमनुदितललाटदृशं
ददृशुर्मिमन्थिषुमिवासुरीः पुरीः ॥
मधिगुणशरासनं जनाः ।
रुद्रमनुदितललाटदृशं
ददृशुर्मिमन्थिषुमिवासुरीः पुरीः ॥
सारांश
AI
जटाओं की लाल आभा और धनुष धारण किए अर्जुन ऐसे लगे मानो साक्षात् शिव त्रिपुरासुर का विनाश करने जा रहे हों।
१२.१५
मरुतां पतिः स्विदहिमांशु-
रुत पृथुशिखः शिखी तपः ।
तप्तुमसुकरमुपक्रमते
न जनोऽयमित्यवयये स तापसैः ॥
रुत पृथुशिखः शिखी तपः ।
तप्तुमसुकरमुपक्रमते
न जनोऽयमित्यवयये स तापसैः ॥
सारांश
AI
तपस्वियों ने उन्हें इंद्र, सूर्य या अग्नि समझा, क्योंकि कोई साधारण मनुष्य ऐसी दुष्कर तपस्या नहीं कर सकता।
१२.१६
न ददाह भूरुहवनानि
हरितनयधाम दूरगम् ।
न स्म नयति परिशोषमपः
सुसहं बभूव न च सिद्धतापसैः ॥
हरितनयधाम दूरगम् ।
न स्म नयति परिशोषमपः
सुसहं बभूव न च सिद्धतापसैः ॥
सारांश
AI
अर्जुन का तेज प्रकृति को क्षति पहुँचाए बिना भी सिद्ध तपस्वियों के लिए असहनीय और दुसह हो गया।
१२.१७
विनयं गुणा इव विवेकमपनयभिदं नया इव । न्यायमवधय इवाशरणाः शरणं ययुः शिवमथो महर्षयः ॥
सारांश
AI
जैसे सद्गुण विवेक का आश्रय लेते हैं, वैसे ही भयभीत महर्षि रक्षा के लिए भगवान शिव की शरण में पहुँचे।
१२.१८
परिवीतमंशुभिरुदस्त-
दिनकरमयूखमण्डलैः ।
शम्भुमुपहतदृशः सहसा
न च ते निचायितुमभिप्रसेहिरे ॥
दिनकरमयूखमण्डलैः ।
शम्भुमुपहतदृशः सहसा
न च ते निचायितुमभिप्रसेहिरे ॥
सारांश
AI
सूर्य को मात देने वाले प्रचंड तेज से घिरे हुए भगवान शिव को ऋषिगण अपनी आंखों से सहसा देख नहीं पाए।
१२.१९
अथ भूतभव्यभवदीश-
मभिमुखयितुं कृतस्तवाः ।
तत्र महसि ददृशुः पुरुषं
कमनीयविग्रहमयुग्मलोचनम् ॥
मभिमुखयितुं कृतस्तवाः ।
तत्र महसि ददृशुः पुरुषं
कमनीयविग्रहमयुग्मलोचनम् ॥
सारांश
AI
स्तुति के बाद ऋषियों ने उस दिव्य प्रकाश के पुंज के भीतर अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले त्रिनेत्रधारी शिव के दर्शन किए।
१२.२०
ककुदे वृषस्य कृतबाहुमकृशपरिणाहशालिनि । स्पर्शसुखमनुभवन्तमुमाकुचयुग्ममण्डल इवार्द्रचन्दने ॥
सारांश
AI
भगवान शिव नंदी के कंधे पर हाथ रखे वैसे ही सुख का अनुभव कर रहे थे जैसे पार्वती के अंगों पर लगे शीतल चंदन से मिलता है।
१२.२१
स्थितमुन्नते तुहिनशैल-
शिरसि भुवनातिवर्तिना ।
साद्रिजलधिजलवाहपथं
सदिगश्नुवानमिव विश्वमोजसा ॥
शिरसि भुवनातिवर्तिना ।
साद्रिजलधिजलवाहपथं
सदिगश्नुवानमिव विश्वमोजसा ॥
सारांश
AI
हिमालय के ऊंचे शिखर पर स्थित वे शिव, अपनी शक्ति से पर्वतों, समुद्रों और मेघों के मार्ग सहित संपूर्ण विश्व को व्याप्त कर रहे हैं।
१२.२२
अनुजानुमध्यमवसक्त-
विततवपुषा महाहिना ।
लोकमखिलमिव भूमिभृता
रवितेजसामवधिनाधिवेष्टितम् ॥
विततवपुषा महाहिना ।
लोकमखिलमिव भूमिभृता
रवितेजसामवधिनाधिवेष्टितम् ॥
सारांश
AI
घुटनों तक लटके हुए विशाल सर्प से घिरे वे शिव ऐसे प्रतीत होते हैं मानो संपूर्ण विश्व को घेरे हुए सूर्य की किरणों की अंतिम सीमा हों।
१२.२३
परिणाहिना तुहिनराशि-
विशदमुपवीतसूत्रताम् ।
नीतमुरगमनुरञ्जयता
शितिना गलेन विलसन्मरीचिना ॥
विशदमुपवीतसूत्रताम् ।
नीतमुरगमनुरञ्जयता
शितिना गलेन विलसन्मरीचिना ॥
सारांश
AI
उनके गले की नीली आभा और चमकती किरणों से युक्त विशाल श्वेत सर्प उनके शरीर पर यज्ञोपवीत के समान सुशोभित हो रहा है।
१२.२४
प्लुतमालतीसितकपाल-
कमुदमुपरुद्धमूर्धजम् ।
शेषमिव सुरसरित्पयसां
शिरसा विसारि शशिधाम बिभ्रतम् ॥
कमुदमुपरुद्धमूर्धजम् ।
शेषमिव सुरसरित्पयसां
शिरसा विसारि शशिधाम बिभ्रतम् ॥
सारांश
AI
मालती के फूलों की तरह श्वेत कपाल और जटाओं में चंद्रमा की किरणों को धारण किए हुए वे ऐसे लगते हैं मानो उनके मस्तक पर गंगा का शेष जल स्थित हो।
१२.२५
मुनयस्ततोऽभिमुखमेत्य
नयनविनिमेषनोदिताः ।
पाण्डुतनयतपसा जनितं
जगतामशर्म भृशमाचचक्षिरे ॥
नयनविनिमेषनोदिताः ।
पाण्डुतनयतपसा जनितं
जगतामशर्म भृशमाचचक्षिरे ॥
सारांश
AI
तदुपरांत, शिव के समक्ष उपस्थित होकर मुनियों ने अर्जुन की तपस्या से उत्पन्न हुए संसार के भारी संताप के विषय में उन्हें सूचित किया।
१२.२६
तरसैव कोऽपि भुवनैकपुरुष पुरुषस्तपस्यति । ज्योतिरमलवपुषोऽपि रवेरभिभूय वृत्र इव भीमविग्रहः ॥
सारांश
AI
मुनियों ने कहा—हे प्रभु, कोई अद्भुत शक्तिशाली पुरुष इस समय तप कर रहा है, जिसकी कांति सूर्य के तेज को भी मात दे रही है और वह वृत्रासुर के समान भयंकर है।
१२.२७
स धनुर्महेषुधि बिभर्ति
कवचमसिमुत्तमं जटाः ।
वल्कमजिनमिति चित्रमिदं
मुनिताविरोधि न च नास्य राजते ॥
कवचमसिमुत्तमं जटाः ।
वल्कमजिनमिति चित्रमिदं
मुनिताविरोधि न च नास्य राजते ॥
सारांश
AI
वह धनुष, बाण, कवच और तलवार धारण किए है, किंतु साथ ही जटा, वल्कल और मृगचर्म भी; मुनि धर्म के विरुद्ध होते हुए भी यह विचित्र वेश उस पर अत्यंत शोभा देता है।
१२.२८
चलनेऽवनिश्चलति तस्य करणनियमे सदिङ्मुखम् । स्तम्भमनुभवति शान्तमरुद्ग्रहतारकागणयुतं नभस्तलम् ॥
सारांश
AI
उसके चलने से पृथ्वी कांपती है और इंद्रियों के संयम करने पर पवन शांत हो जाता है तथा नक्षत्रों एवं ग्रहों सहित संपूर्ण आकाश स्तंभित सा हो जाता है।
१२.२९
स तदोजसा विजितसार-
ममरदितिजोपसंहितम् ।
विश्वमिदमपिदधाति पुरा
किमिवास्ति यन्न तपसामदुष्करम् ॥
ममरदितिजोपसंहितम् ।
विश्वमिदमपिदधाति पुरा
किमिवास्ति यन्न तपसामदुष्करम् ॥
सारांश
AI
वह अपने तेज से देवताओं और असुरों के सार को पराजित कर इस विश्व को आच्छादित कर रहा है; वास्तव में तपस्या के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
१२.३०
विजिगीषते यदि जगन्ति युगपदथ संजिहीर्षति । प्राप्तुमभवमभिवाञ्छति वा वयमस्य नो विषहितुं क्षमा रुचः ॥
सारांश
AI
वह एक साथ सभी लोकों को जीतना चाहता है या संहार करना चाहता है, अथवा मोक्ष की इच्छा रखता है—हम उसके तेज को सहने में असमर्थ हैं।
१२.३१
किमुपेक्षसे कथय नाथ न तव विदितं न किंचन । त्रातुमलमभयदार्हसि नस्त्वयि मा स्म शासति भवत्पराभवः ॥
सारांश
AI
हे नाथ, आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। आप हमें अभय दान देने में समर्थ हैं; आपके शासन में हमारा पराभव नहीं होना चाहिए।
१२.३२
इति गां विधाय विरतेषु मुनिषु वचनं समाददे । भिन्नजलधिजलनादगुरु ध्वनयन्दिशां विवरमन्धकान्तकः ॥
सारांश
AI
मुनियों के मौन होने पर, अंधकासुर का वध करने वाले शिव ने समुद्र की गर्जना के समान गंभीर स्वर में दिशाओं को गुंजायमान करते हुए उत्तर दिया।
१२.३३
बदरीतपोवननिवास-
निरतमवगात मान्यथा ।
धातुरुदयनिधने जगतां
नरमंशमादिपुरुषस्य गां गतम् ॥
निरतमवगात मान्यथा ।
धातुरुदयनिधने जगतां
नरमंशमादिपुरुषस्य गां गतम् ॥
सारांश
AI
भगवान शिव ने कहा—इसे अन्यथा न समझें, यह साक्षात नारायण का अंश 'नर' है, जो बदरीवन में तपस्यारत रहता है और जगत के कल्याण के लिए पृथ्वी पर आया है।
१२.३४
द्विषतः परासिसिषुरेष
सकलभुवनाभितापिनः ।
क्रान्तकुलिशकरवीर्यबला-
न्मदुपासनं विहितवान्महत्तपः ॥
सकलभुवनाभितापिनः ।
क्रान्तकुलिशकरवीर्यबला-
न्मदुपासनं विहितवान्महत्तपः ॥
सारांश
AI
जगत को संतापित करने वाले शत्रुओं को जीतने की इच्छा से, इंद्र के वज्र जैसी शक्ति वाला यह वीर मेरी आराधना हेतु घोर तप कर रहा है।
१२.३५
अयमच्युतश्च वचनेन
सरसिरुहजन्मनः प्रजाः ।
पातुमसुरनिधनेन विभू
भुवमभ्युपेत्य मनुजेषु तिष्ठतः ॥
सरसिरुहजन्मनः प्रजाः ।
पातुमसुरनिधनेन विभू
भुवमभ्युपेत्य मनुजेषु तिष्ठतः ॥
सारांश
AI
ब्रह्मा की आज्ञा से यह और अच्युत असुरों का विनाश कर प्रजा की रक्षा हेतु मनुष्यों के बीच अवतार लेकर स्थित हैं।
१२.३६
सुरकृत्यमेतदवगम्य
निपुणमिति मूकदानवः ।
हन्तुमभिपतति पाण्डुसुतं
त्वरया तदत्र सह गम्यतां मया ॥
निपुणमिति मूकदानवः ।
हन्तुमभिपतति पाण्डुसुतं
त्वरया तदत्र सह गम्यतां मया ॥
सारांश
AI
देवताओं के इस कार्य को जानकर मूक नामक दानव अर्जुन को मारने के लिए तेजी से आ रहा है, इसलिए तुम सब मेरे साथ चलो।
१२.३७
विवरेऽपि नैनमनिगूढ-
मभिभवितुमेष पारयन् ।
पापनिरतिरविशङ्कितया
विजयं व्यवस्यति वराहमायया ॥
मभिभवितुमेष पारयन् ।
पापनिरतिरविशङ्कितया
विजयं व्यवस्यति वराहमायया ॥
सारांश
AI
वह पापकर्मी दानव अर्जुन को सीधे पराजित करने में असमर्थ होकर, अब कपटपूर्ण वराह का रूप धारण कर उसे मारने का प्रयत्न कर रहा है।
१२.३८
निहते विडम्बितकिरातनृपतिवपुषा रिपौ मया । मुक्तनिशितविशिखः प्रसभं मृगयाविवादमयमाचरिष्यति ॥
सारांश
AI
जब मैं किरात राजा का वेष धारण कर उस शत्रु को मारूँगा, तब तीक्ष्ण बाण चलाने वाला यह अर्जुन मुझसे शिकार के अधिकार के लिए युद्ध करेगा।
१२.३९
तपसा निपीडितकृशस्य
विरहितसहायसम्पदः ।
सत्त्वविहितमतुलं भुजयो-
र्बलमस्य पश्यत मृधेऽधिकुप्यतः ॥
विरहितसहायसम्पदः ।
सत्त्वविहितमतुलं भुजयो-
र्बलमस्य पश्यत मृधेऽधिकुप्यतः ॥
सारांश
AI
तपस्या से क्षीण और सहायकों से रहित होने पर भी, युद्ध में क्रोधित होने पर उसकी भुजाओं के अतुलनीय बल को तुम स्वयं देखना।
१२.४०
इति तानुदारमनुनीय विषमहरिचन्दनालिना । घर्मजनितपुलकेन लसद्गजमौक्तिकावलिगुणेन वक्षसा ॥
सारांश
AI
इस प्रकार मुनियों को सांत्वना देते हुए शिव के चंदन लगे और मोतियों की माला से सुशोभित विशाल वक्षस्थल पर रोमांच के कारण पसीना आ गया।
१२.४१
वदनेन पुष्पितलतान्तनियमितविलम्बितमौलिना । बिभ्रदरुणनयनेन रुचं शिखिपिच्छलाञ्छितकपोलभित्तिना ॥
सारांश
AI
खिले हुए फूलों वाली लताओं से बंधी हुई लंबी जटाओं वाले, लाल नेत्रों और मोर पंखों से सुशोभित कपोलों वाले वे किरात वेशधारी शिव अत्यंत शोभायमान हो रहे थे।
१२.४२
बृहदुद्वहञ्जलदनादि
धनुरुपहितैकमार्गणम् ।
मेघनिचय इव संववृते
रुचिरः किरातपृतनापतिः शिवः ॥
धनुरुपहितैकमार्गणम् ।
मेघनिचय इव संववृते
रुचिरः किरातपृतनापतिः शिवः ॥
सारांश
AI
बादलों जैसी गंभीर गर्जना करने वाले विशाल धनुष पर बाण चढ़ाए हुए, किरात सेनापति के रूप में शिव मेघों के समूह के समान सुशोभित हो रहे थे।
१२.४३
अनुकूलमस्य च विचिन्त्य
गणपतिभिरात्तविग्रहैः ।
शूलपरशुशरचापभृतै-
र्महती वनेचरचमूर्विनिर्ममे ॥
गणपतिभिरात्तविग्रहैः ।
शूलपरशुशरचापभृतै-
र्महती वनेचरचमूर्विनिर्ममे ॥
सारांश
AI
शिव की इच्छा जानकर विभिन्न शरीर धारण किए हुए गणपतियों ने शूल, फरसा, बाण और धनुष लेकर भीलों की एक विशाल सेना तैयार कर ली।
१२.४४
विरचय्य काननविभाग-
मनुगिरमथेश्वराज्ञया ।
भीमनिनदपिहितोरुभुवः
परितोऽपदिश्य मृगयां प्रतस्थिरे ॥
मनुगिरमथेश्वराज्ञया ।
भीमनिनदपिहितोरुभुवः
परितोऽपदिश्य मृगयां प्रतस्थिरे ॥
सारांश
AI
भगवान शिव की आज्ञा से वन के विभिन्न भागों को विभाजित कर, वे भीषण गर्जना से पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए शिकार के बहाने चारों ओर निकल पड़े।
१२.४५
क्षुभिताभिनिःसृतविभिन्न-
शकुनिमृगयूथनिःस्वनैः ।
पूर्णपृथुवनगुहाविवरः
सहसा भयादिव ररास भूधरः ॥
शकुनिमृगयूथनिःस्वनैः ।
पूर्णपृथुवनगुहाविवरः
सहसा भयादिव ररास भूधरः ॥
सारांश
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घबराकर भागते हुए पशु-पक्षियों के कोलाहल से वन की गुफाएं भर गईं, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह पर्वत भय के कारण स्वयं चीख रहा हो।
१२.४६
न विरोधिनी रुषमियाय
पथि मृगविहङ्गसंहतिः ।
घ्नन्ति सहजमपि भूरिभियः
सममागताः सपदि वैरमापदः ॥
पथि मृगविहङ्गसंहतिः ।
घ्नन्ति सहजमपि भूरिभियः
सममागताः सपदि वैरमापदः ॥
सारांश
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मार्ग में परस्पर विरोधी पशु-पक्षी भी क्रोधित नहीं हुए; विपत्ति के समय अत्यधिक भयभीत प्राणी अपने स्वाभाविक जन्मजात वैर को भी त्याग देते हैं।
१२.४७
चमरीगणैर्गणबलस्य बलवति भयेऽप्युपस्थिते । वंशविततिषु विषक्तपृथुप्रियबालवालधिभिराददे धृतिः ॥
सारांश
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शिव के गणों की सेना के आने पर भारी भय के बावजूद, चमरी गायों ने बाँसों के झुरमुटों में फंसी अपनी प्रिय पूंछों को बचाने के लिए धैर्य बनाए रखा।
१२.४८
हरसैनिकाः प्रतिभयेऽपि गजमदसुगन्धिकेसरैः । स्वस्थमभिददृशिरे सहसा प्रतिबोधजृम्भमुखैर्मृगाधिपैः ॥
सारांश
AI
शिव के सैनिकों ने हाथियों के मद की सुगंध वाले केसर युक्त सिंहों को देखा, जो नींद से जागकर जम्हाई ले रहे थे और भय के क्षणों में भी शांत थे।
१२.४९
बिभरांबभूवुरपवृत्त-
जठरशफरीकुलाकुलाः ।
पङ्कविषमिततटाः सरितः
करिरुग्णचन्दनरसारुणं पयः ॥
जठरशफरीकुलाकुलाः ।
पङ्कविषमिततटाः सरितः
करिरुग्णचन्दनरसारुणं पयः ॥
सारांश
AI
नदियों का जल हाथियों द्वारा तोड़े गए चंदन के रस से लाल हो गया था; कीचड़ भरे तटों वाली उन नदियों में मछलियाँ व्याकुल होकर उलट-पुलट रही थीं।
१२.५०
महिषक्षतागुरुतमाल-
नलदसुरभिः सदागतिः ।
व्यस्तशुकनिभशिलाकुसुमः
प्रणुदन्ववौ वनसदां परिश्रमम् ॥
नलदसुरभिः सदागतिः ।
व्यस्तशुकनिभशिलाकुसुमः
प्रणुदन्ववौ वनसदां परिश्रमम् ॥
सारांश
AI
जंगली भैंसों द्वारा कुचले गए अगरु, तमाल और खस की सुगंध से युक्त वायु, तोते के समान रंग वाले शिला-पुष्पों को बिखेरती हुई वनवासियों की थकान मिटाने लगी।
॥ इति द्वादशः सर्गः ॥
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