अन्वयः
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उद्यतभुजस्य तस्य शिरसः उपरि विततम्, भुवनविवरे परिकीर्णम्, दुरासदम् ज्योतिः, मुनिदिवौकसाम् निजात् पथः जगृहे ।
English Summary
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A brilliant, unapproachable light, spreading above the head of Arjuna who had his arms raised, and diffused in the space of the universe, seized the paths of the sages and celestial beings from their own possession.
सारांश
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अर्जुन के मस्तक से निकले तीव्र प्रकाश ने संपूर्ण आकाश को व्याप्त कर लिया और देवताओं के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
परिकीर्णमिति ॥ उद्यतभुजस्योर्ध्ववाहोस्तस्य शिरस उपरि ।
षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन (अष्टाध्यायी २.३.३० ) इति षष्ठी । विततं विस्तृतं भुवनयोर्विवरे द्यावापृथिव्योरन्तराले परिकीर्णं व्याप्तं दुरासदं दुर्धर्षं ज्योतिस्तेजो मुनीनां दिवौकसां च निजान्नियतात्पथो मार्गाज्जगृहे जग्राह । प्रतिबबन्धेत्यर्थः॥
पदच्छेदः
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| परिकीर्णम् | परिकीर्ण (परि√कॄ+क्त, १.१) | spread |
| उद्यतभुजस्य | उद्यत (उद्√यम्+क्त)–भुज (६.१) | of him with raised arms |
| भुवनविवरे | भुवन–विवर (७.१) | in the space of the universe |
| दुरासदम् | दुरासद (१.१) | unapproachable |
| ज्योतिः | ज्योतिस् (१.१) | light |
| उपरि | उपरि | above |
| शिरसः | शिरस् (६.१) | of the head |
| विततम् | वितत (वि√तन्+क्त, १.१) | extended |
| जगृहे | जगृहे (√ग्रह् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | seized |
| निजात् | निज (५.१) | from their own |
| मुनिदिवौकसाम् | मुनि–दिवौकस् (६.३) | of the sages and celestial beings |
| पथः | पथिन् (२.३) | the paths |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | की | र्ण | मु | द्य | त | भु | ज | स्य | |||
| भु | व | न | वि | व | रे | दु | रा | स | दम् | |||
| ज्यो | ति | रु | प | रि | शि | र | सो | वि | त | तं | ||
| ज | गृ | हे | नि | जा | न्मु | नि | दि | वौ | क | सां | प | थः |
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