सारांश
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सूर्योन्मुख होकर और एक पैर पर खड़े होकर निराहार अर्जुन ने तपस्या में अनेक दिन व्यतीत किए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अभिरश्मीति ॥ अभिरश्मिमाल्यभिसूर्यं सूर्याभिमुखं भुव्येकचरणं निषीदत एकचरणेन तिष्ठतो विमलस्य बाह्यान्तरशुद्धिमतः । धृता जयधृतिर्जयेच्छा येन तस्यानाशुषोऽनश्नतः।
उपेयिताननाश्वाननूचानश्व इति निपातः। तृस्यार्जुनस्य बहूनां पूरणा बहुतिथाः। बहुसंख्यका इत्यर्थः।तस्य पूरणे डट् (अष्टाध्यायी ५.२.४८ ) ।बहुपूगगणसंघस्य तिथुक् (अष्टाध्यायी ५.२.५२ ) इति तिथुगागमः। तिथयो दिनानि प्रतिजग्मुः। अत्र तिथिशब्दः पुंलिङ्गः ।तदाद्यास्तिथयो: द्वयोः इत्यभिधानात् । अन्यथा बहुतिथा इत्यत्र टित्वान्ङीप्स्यात्
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | र | श्मि | मा | लि | वि | म | ल | स्य | |||
| धृ | त | ज | य | धृ | ते | र | ना | शु | षः | |||
| त | स्य | भु | वि | ब | हु | ति | था | स्ति | थ | यः | ||
| प्र | ति | ज | ग्मु | रे | क | च | र | णं | नि | षी | द | तः |
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