सारांश
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इंद्र के आदेश पर अर्जुन ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विधिपूर्वक कठिन तपस्या प्रारंभ की।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥ अथेन्द्रतिरोधानानन्तरं रुचिरवदन इन्द्रसाक्षात्कारसंतोषात्प्रसन्नमुखो धनंजयोऽर्जुनो वासवस्य वचनेनोपदेशेन त्रिलोचनं शिवं क्लान्तिरहितं यथा तथाभिराधयितुं प्रसादयितुं तपांसि विधिवद्विध्यर्हम् । यथाशास्त्रमित्यर्थः ।
तदर्हम् (अष्टाध्यायी ५.१.११७ ) इति वतिप्रत्ययः । विदधे चक्रे । अस्मिन्सर्ग उद्गतावृत्तम्-सजमादिमे सलघुकौ च नसजगुरुकैरथोद्गता । अङ्घ्रिगतभनजला गयुताः सजसा जगौ चरणमेकतः पठेत् ॥ इति लक्षणात् ॥
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | वा | स | व | स्य | व | च | ने | न | |||
| रु | चि | र | व | द | न | स्त्रि | लो | च | नम् | |||
| क्ला | न्ति | र | हि | त | म | भि | रा | ध | यि | तुं | ||
| वि | धि | व | त्त | पां | सि | वि | द | धे | ध | नं | ज | यः |
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