अन्वयः
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क्षुभिताभिनिःसृतविभिन्नशकुनिमृगयूथनिःस्वनैः पूर्णपृथुवनगुहाविवरः भूधरः सहसा भयात् इव ररास।
English Summary
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The mountain, its vast forest caves and hollows filled with the cries of scattered flocks of birds and herds of animals that fled in agitation, suddenly roared as if out of fear.
सारांश
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घबराकर भागते हुए पशु-पक्षियों के कोलाहल से वन की गुफाएं भर गईं, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह पर्वत भय के कारण स्वयं चीख रहा हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
क्षुमितेति ॥ क्षुभितास्त्रस्ता अभिनि:सृताः स्वस्थानान्निर्गता विभिन्ना मुक्तसंघाश्च ये शकुनयः पक्षिणो मृगाश्च तेषां यूथानि तानि तेषां निःस्वनैः पूर्णानि पृथूनि वनानि गुहाविवराणि च यस्य स भूधरः सहसा भयादिवेत्युत्प्रेक्षा । ररास चुक्रोश ॥
पदच्छेदः
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| क्षुभिताभिनिःसृतविभिन्नशकुनिमृगयूथनिःस्वनैः | क्षुभित–अभिनिःसृत–विभिन्न–शकुनि–मृगयूथ–निःस्वन (३.३) | with the cries of agitated, fleeing, scattered flocks of birds and herds of animals |
| पूर्णपृथुवनगुहाविवरः | पूर्ण–पृथु–वनगुहा–विवर (१.१) | whose vast forest caves and hollows were filled |
| सहसा | सहसा | suddenly |
| भयात् | भय (५.१) | out of fear |
| इव | इव | as if |
| ररास | ररास (√रस् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | roared |
| भूधरः | भूधर (१.१) | the mountain |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षु | भि | ता | भि | निः | सृ | त | वि | भि | न्न | |||
| श | कु | नि | मृ | ग | यू | थ | निः | स्व | नैः | |||
| पू | र्ण | पृ | थु | व | न | गु | हा | वि | व | रः | ||
| स | ह | सा | भ | या | दि | व | र | रा | स | भू | ध | रः |
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