अन्वयः
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दूरगम् हरितनयधाम भूरुहवनानि न ददाह, अपः परिशोषम् न नयति स्म । (तत् धाम) सिद्धतापसैः सुसहम् बभूव, न च (असुसहम्) ।
English Summary
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The far-reaching radiance of Arjuna (son of Hari/Indra) did not burn the forests of trees, nor did it dry up the waters. It was easily bearable for the perfected ascetics.
सारांश
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अर्जुन का तेज प्रकृति को क्षति पहुँचाए बिना भी सिद्ध तपस्वियों के लिए असहनीय और दुसह हो गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
न ददाहेति ॥ दूरगम् । व्यापकमित्यर्थः। हरितनयस्येन्द्रसुतस्यार्जुनस्य धाम तेजो भूरुहवनानि वृक्षखण्डान्न ददाह । अग्निवदिति भावः । तथापो जलानि परिशोषं न नयति स्म । अर्कवदिति भावः । तथापीति शेषः । सिद्धाश्च तापसाश्च तैः सुसहं न बभूव । अतोऽस्यालौकिकं तेज इति भावः । अत एव दुःसहत्वदाहाद्यजनकत्वयोर्वि रोधाद्विरोधाभासोऽलंकार:-
आभासत्वे विरोधस्य विरोधालंकृतिर्मता इति लक्षणात् ॥
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| ददाह | ददाह (√दह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | did burn |
| भूरुहवनानि | भूरुह–वन (२.३) | the forests of trees |
| हरितनयधाम | हरितनय–धामन् (१.१) | the radiance of Indra's son |
| दूरगम् | दूरग (१.१) | far-reaching |
| न | न | not |
| स्म | स्म | (makes past tense) |
| नयति | नयति (√नी कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does lead |
| परिशोषम् | परिशोष (२.१) | to dryness |
| अपः | अप् (२.३) | the waters |
| सुसहम् | सुसह (१.१) | easily bearable |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | it was |
| न | न | not |
| च | च | and |
| सिद्धतापसैः | सिद्ध–तापस (३.३) | by the perfected ascetics |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | द | दा | ह | भू | रु | ह | व | ना | नि | |||
| ह | रि | त | न | य | धा | म | दू | र | गम् | |||
| न | स्म | न | य | ति | प | रि | शो | ष | म | पः | ||
| सु | स | हं | ब | भू | व | न | च | सि | द्ध | ता | प | सैः |
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