अन्वयः
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इति तान् उदारम् अनुनीय, ... वक्षसा, ... वदनेन रुचम् बिभ्रत्, बृहत् जलदनादि उपहितैकमार्गणम् धनुः उद्वहन्, रुचिरः किरातपृतनापतिः शिवः मेघनिचयः इव संववृते।
English Summary
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(Conclusion of the three-verse description) Thus, having persuaded the sages, the handsome Shiva, the lord of the Kirata army, appeared like a mass of clouds, bearing a great bow that roared like a thundercloud and was fitted with a single arrow.
सारांश
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बादलों जैसी गंभीर गर्जना करने वाले विशाल धनुष पर बाण चढ़ाए हुए, किरात सेनापति के रूप में शिव मेघों के समूह के समान सुशोभित हो रहे थे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
बृहदिति ॥ पुनश्च । जलद् इव नदतीति जलदनादि ।
कर्तर्युपमाने (अष्टाध्यायी ३.२.७९ ) इति णिनिः। उपहितैकमार्गणं संहितैकबाणं धनुरुद्वहन् । अत एव मेघनिचय इव स्थित इत्युपमा । अत्र विशेषके स्वभावोक्तिरलंकारः । स्वभावोक्तिरसौ चारु यथावद्वस्तुवर्णनम् इति लक्षणात् ॥ अनकूलमस्य च विचिन्त्य गणपतिभिरात्तविग्रहै:। शूलपरशुशरचापभृतैर्महती वनेचरचमूर्विनिर्ममे
पदच्छेदः
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| बृहत् | बृहत् (२.१) | great |
| उद्वहन् | उद्वहत् (उद्√वह्+शतृ, १.१) | carrying |
| जलदनादि | जलद–नादिन् (२.१) | roaring like a thundercloud |
| धनुः | धनुस् (२.१) | a bow |
| उपहितैकमार्गणम् | उपहित–एक–मार्गण (२.१) | fitted with a single arrow |
| मेघनिचयः | मेघ–निचय (१.१) | a mass of clouds |
| इव | इव | like |
| संववृते | संववृते (सम्√वृत् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | appeared |
| रुचिरः | रुचिर (१.१) | handsome |
| किरातपृतनापतिः | किरात–पृतना–पति (१.१) | the lord of the Kirata army |
| शिवः | शिव (१.१) | Shiva |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बृ | ह | दु | द्व | ह | ञ्ज | ल | द | ना | दि | |||
| ध | नु | रु | प | हि | तै | क | मा | र्ग | णम् | |||
| मे | घ | नि | च | य | इ | व | सं | व | वृ | ते | ||
| रु | चि | रः | कि | रा | त | पृ | त | ना | प | तिः | शि | वः |
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