अन्वयः
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कवचम् बिभ्रत्, उपवीतपदनिहितसज्यकार्मुकः सः, महेन्द्रधनुःपरिवीतभीमगहनः शैलपतिः इव, विदिद्युते ।
English Summary
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Wearing armor and with his strung bow placed in the position of the sacred thread, he shone brightly. He resembled the lord of mountains (Himalaya), appearing formidable and deep, encircled by Indra's bow (the rainbow).
सारांश
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कवच और धनुष धारण किए हुए अर्जुन वैसे ही सुशोभित हुए जैसे इंद्रधनुष से घिरा हुआ कोई विशाल पर्वत।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कवचमिति ॥ कवचं वर्म बिभ्रदुपवीतपदे यज्ञोपवीतस्थाने निहितमारोपितं सज्यं कार्मुकं येन स तथोक्तः । सोऽर्जुनो महेन्द्रधनुषा परिवीतं परिवेष्टितं भीमं गहनं वनं यस्य स शैलपतिरिव हिमवानिव विदिद्युते शुशुभे ॥
पदच्छेदः
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| कवचम् | कवच (२.१) | armor |
| सः | तद् (१.१) | he |
| बिभ्रत् | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | wearing |
| उपवीतपदनिहितसज्यकार्मुकः | उपवीत–पद–निहित (नि√धा+क्त)–सज्य–कार्मुक (१.१) | he who had placed his strung bow in the position of the sacred thread |
| शैलपतिः | शैल–पति (१.१) | the lord of mountains |
| इव | इव | like |
| महेन्द्रधनुःपरिवीतभीमगहनः | महेन्द्र–धनुस्–परिवीत (परि√वी+क्त)–भीम–गहन (१.१) | one who is formidable and deep, encircled by Indra's bow (rainbow) |
| विदिद्युते | विदिद्युते (वि√द्युत् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone brightly |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | व | चं | स | बि | भ्र | दु | प | वी | त | |||
| प | द | नि | हि | त | स | ज्य | का | र्मु | कः | |||
| शै | ल | प | ति | रि | व | म | हे | न्द्र | ध | नुः | ||
| प | रि | वी | त | भी | म | ग | ह | नो | वि | दि | द्यु | ते |
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