अन्वयः
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अपवृत्तजठरशफरीकुलआकुलाः पङ्कविषमिततटाः सरितः करिरुग्णचन्दनरसारुणम् पयः बिभरांबभूवुः।
English Summary
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The rivers, whose banks were made uneven by mud and which were agitated with schools of shaphari fish turned on their bellies, carried water that was reddish with the sap of sandalwood trees broken by elephants.
सारांश
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नदियों का जल हाथियों द्वारा तोड़े गए चंदन के रस से लाल हो गया था; कीचड़ भरे तटों वाली उन नदियों में मछलियाँ व्याकुल होकर उलट-पुलट रही थीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
बिभरामिति ॥अपवृत्तजठरैस्तत्कालक्षोभाल्लुठितोदरैः शफरीकुलैराकुला व्याप्ताः पङ्कैर्विषमितानि दुर्गमीकृतानि तटानि कूलानि यासां ताः सरितः करिभिः । पलायमानैरिति शेषः । रुग्णानां मार्गरोधितया भग्नानाम् ।
ओदितश्च (अष्टाध्यायी ८.२.४५ ) इति निष्ठानत्वम् । चन्दनानां रसैररुणं करिरुग्णचन्दनरसारुणं पयो बिभरांबभूवुः । भृधातोः भीह्रीभृहुवांश्लुवच्च' इत्याम्प्रत्ययः । श्लुवद्भावश्च । 'कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि' इति भुवोऽनुप्रयोगः ॥
पदच्छेदः
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| बिभरांबभूवुः | बिभरांबभूवुः (√भृ +आम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | carried |
| अपवृत्तजठरशफरीकुलाकुलाः | अपवृत्त–जठर–शफरीकुल–आकुल (१.३) | agitated with schools of shaphari fish turned on their bellies |
| पङ्कविषमिततटाः | पङ्क–विषमित–तट (१.३) | whose banks were made uneven by mud |
| सरितः | सरित् (१.३) | the rivers |
| करिरुग्णचन्दनरसारुणम् | करि–रुग्ण–चन्दनरस–अरुण (२.१) | reddish with the sap of sandalwood trees broken by elephants |
| पयः | पयस् (२.१) | water |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बि | भ | रां | ब | भू | वु | र | प | वृ | त्त | |||
| ज | ठ | र | श | फ | री | कु | ला | कु | लाः | |||
| प | ङ्क | वि | ष | मि | त | त | टाः | स | रि | तः | ||
| क | रि | रु | ग्ण | च | न्द | न | र | सा | रु | णं | प | यः |
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