अन्वयः
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शितिना विलसन्मरीचिना गलेन अनुरञ्जयता (शिवेन), परिणाहिना तुहिनराशिविशदम् उरगम् उपवीतसूत्रताम् नीतम् (आसीत्) ।
English Summary
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The large serpent, white as a heap of snow, was made into a sacred thread, colored by his dark throat from which brilliant rays were emanating.
सारांश
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उनके गले की नीली आभा और चमकती किरणों से युक्त विशाल श्वेत सर्प उनके शरीर पर यज्ञोपवीत के समान सुशोभित हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
परिणाहिनेति ॥ पुनश्च । तुहिनराशिवद्विशदं शुभ्रमुपवीतसूत्रतां यज्ञोपवीतत्वं नीतं प्रापितमुरगं शेषाहिमनुरञ्जयता स्वगुणोपरक्तं कुर्वता । श्यामीकुर्वतेत्यर्थः। परिणाहिना विशालेन विलसन्मरीचिना प्रसृतकिरणेन शितिना नीलेन गलेन कण्ठेनोपलक्षितम् ।
कण्ठो गलोऽथ ग्रीवायाम् इत्यमरः (अमरकोशः २.६.८९ ) । अत्रोरगस्य स्वधवलिमत्यागेनान्यजन्यनीलिमग्रहणात्तद्गुणालंकार:-स्वगुणत्यागादन्योत्कृष्टगुणग्रहस्तद्गुणः इति लक्षणात्॥
पदच्छेदः
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| परिणाहिना | परिणाहिन् (३.१) | by the large |
| तुहिनराशिविशदम् | तुहिनराशि–विशद (२.१) | white as a heap of snow |
| उपवीतसूत्रताम् | उपवीतसूत्रता (२.१) | the state of a sacred thread |
| नीतम् | नीत (√नी+क्त, २.१) | was made into |
| उरगम् | उरग (२.१) | serpent |
| अनुरञ्जयता | अनुरञ्जयत् (अनु√रञ्ज्+णिच्+शतृ, ३.१) | by the one coloring |
| शितिना | शिति (३.१) | dark |
| गलेन | गल (३.१) | by the throat |
| विलसन्मरीचिना | विलसत् (वि√लस्+शतृ)–मरीचि (३.१) | from which brilliant rays were emanating |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | णा | हि | ना | तु | हि | न | रा | शि | |||
| वि | श | द | मु | प | वी | त | सू | त्र | ताम् | |||
| नी | त | मु | र | ग | म | नु | र | ञ्ज | य | ता | ||
| शि | ति | ना | ग | ले | न | वि | ल | स | न्म | री | चि | ना |
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