अन्वयः
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यदि (अयम्) युगपत् जगन्ति विजिगीषते, अथ (वा) संजिहीर्षति, वा अभवम् प्राप्तुम् अभिवाञ्छति, (तर्हि) वयम् अस्य रुचः विषहितुम् क्षमाः न (स्मः)।
English Summary
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The sages say: "Whether he desires to conquer the worlds all at once, or wishes to destroy them, or seeks liberation (non-existence), we are not able to endure his splendors (or desires)."
सारांश
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वह एक साथ सभी लोकों को जीतना चाहता है या संहार करना चाहता है, अथवा मोक्ष की इच्छा रखता है—हम उसके तेज को सहने में असमर्थ हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विजिगीषत इति ॥ स पुरुषो जगन्ति भुवनानि युगपद्विजिगीषते यदि विजेतुमिच्छति वा।
पूर्ववत्सनः इत्यात्मनेपदम् । अथ युगपत्संजिहीर्षति संहर्तुमिच्छति वा। अभवमपवर्गं प्राप्तुमभिवाञ्छति वा । न विद्मो वयमिति शेषः । किं तु । वयमप्यस्य रुचस्तेजांसि विषहितुं सोढुम्। तीषसहलुभरुषरिषः (अष्टाध्यायी ७.२.४८ ) इति विकल्पादिडागमः । नो क्षमा न शक्ताः । केचित् रुचः कामितानि विषहितुमवधारयितुम् इति व्याचक्षते । तत्र सहेरवधारणार्थत्वं विचार्यम् ॥
पदच्छेदः
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| विजिगीषते | विजिगीषते (वि√जि +सन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | desires to conquer |
| यदि | यदि | if |
| जगन्ति | जगत् (२.३) | the worlds |
| युगपत् | युगपत् | simultaneously |
| अथ | अथ | or |
| संजिहीर्षति | संजिहीर्षति (सम्√हृ +सन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | wishes to destroy |
| प्राप्तुम् | प्राप्तुम् (प्र√आप्+तुमुन्) | to attain |
| अभवम् | अभव (२.१) | liberation (non-existence) |
| अभिवाञ्छति | अभिवाञ्छति (अभि√वाञ्छ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | desires |
| वा | वा | or |
| वयम् | अस्मद् (१.३) | we |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| नो | न | not |
| विषहितुम् | विषहितुम् (वि√सह्+णिच्+तुमुन्) | to endure |
| क्षमाः | क्षमा (१.३) | are able |
| रुचः | रुच् (२.३) | splendors |
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