अन्वयः
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अयम् जनः न (अस्ति), (किं) मरुताम् पतिः स्वित्? उत अहिमांशुः? (उत) पृथुशिखः शिखी? (यः) असुकरम् तपः तप्तुम् उपक्रमते, इति सः तापसैः अवयये ।
English Summary
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The ascetics concluded about him, "This is no mere mortal. Is it Indra, the lord of the Maruts? Or the sun? Or the large-flamed fire, who has undertaken to perform this difficult penance?"
सारांश
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तपस्वियों ने उन्हें इंद्र, सूर्य या अग्नि समझा, क्योंकि कोई साधारण मनुष्य ऐसी दुष्कर तपस्या नहीं कर सकता।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मरुतामिति । मरुतां पतिः स्विद्देवेन्द्रो वा । अहिमांशुरुत सूर्यो वा । पृथुशिखो महाज्वालः शिखी पावको वा । असुकरं दुष्करं तपस्तप्तुमुपक्रमते । अयं जनः पुरुषः कश्चित्प्राकृतो नेति सोऽर्जुनस्तापसैस्तपस्विभिः।
अण् च (अष्टाध्यायी ५.२.१०३ ) इति मत्वर्थीयोऽण्प्रत्ययः। अवययेऽवगतः । यातेरवपूर्वात्कर्मणि लिट् । अत्रेन्द्रत्वादिकमारोप्य जनत्वापवादात्साम्यमारोप्यापह्नवालंकारः। सामान्य लक्षणं तु -निषिद्धविषये साम्यारोपो ह्यपह्नवः' इति ॥
पदच्छेदः
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| मरुताम् | मरुत् (६.३) | of the Maruts |
| पतिः | पति (१.१) | the lord (Indra) |
| स्वित् | स्वित् | (particle of doubt) |
| अहिमांशुः | अहिमांशु (१.१) | the sun |
| उत | उत | or |
| पृथुशिखः | पृथु–शिखा (१.१) | large-flamed |
| शिखी | शिखिन् (१.१) | fire |
| तपः | तपस् (२.१) | penance |
| तप्तुम् | तप्तुम् (√तप्+तुमुन्) | to perform |
| असुकरम् | असुकर (२.१) | difficult |
| उपक्रमते | उपक्रमते (उप√क्रम् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | undertakes |
| न | न | not |
| जनः | जन (१.१) | a mortal |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| इति | इति | thus |
| अवयये | अवयये (अव√इ भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was concluded |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तापसैः | तापस (३.३) | by the ascetics |
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | रु | तां | प | तिः | स्वि | द | हि | मां | शु | |||
| रु | त | पृ | थु | शि | खः | शि | खी | त | पः | |||
| त | प्तु | म | सु | क | र | मु | प | क्र | म | ते | ||
| न | ज | नो | ऽय | मि | त्य | व | य | ये | स | ता | प | सैः |
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