१३.१
वपुषां परमेण भूधराणा-
मथ सम्भाव्यपराक्रमं विभेदे ।
मृगमाशु विलोकयांचकार
स्थिरदंष्ट्रोग्रमुखं महेन्द्रसूनुः ॥
मथ सम्भाव्यपराक्रमं विभेदे ।
मृगमाशु विलोकयांचकार
स्थिरदंष्ट्रोग्रमुखं महेन्द्रसूनुः ॥
सारांश
AI
अर्जुन ने पर्वतों के समान विशाल शरीर वाले, पराक्रमी, तीक्ष्ण दाढ़ों और भयानक मुख वाले एक वराह (जंगली सूअर) को शीघ्रता से देखा।
१३.२
स्फुटबद्धसटोन्नतिः स दूरा-
दभिधावन्नवधीरितान्यकृत्यः ।
जयमिच्छति तस्य जातशङ्के
मनसीमं मुहुराददे वितर्कम् ॥
दभिधावन्नवधीरितान्यकृत्यः ।
जयमिच्छति तस्य जातशङ्के
मनसीमं मुहुराददे वितर्कम् ॥
सारांश
AI
स्पष्ट रूप से उठी हुई गर्दन के बालों वाला वह वराह अन्य कार्यों को छोड़कर दूर से ही आक्रमण के लिए दौड़ा, जिससे अर्जुन के मन में अनेक वितर्क उत्पन्न हुए।
१३.३
घनपोत्रविदीर्णशालमूलो
निबिडस्कन्धनिकाषरुग्णवप्रः ।
अयमेकचरोऽभिवर्तते मां
समरायेव समाजुहूषमाणः ॥
निबिडस्कन्धनिकाषरुग्णवप्रः ।
अयमेकचरोऽभिवर्तते मां
समरायेव समाजुहूषमाणः ॥
सारांश
AI
अर्जुन ने देखा कि वह वराह अपने कठोर थूथन से शाल वृक्षों को उखाड़ता और टीलों को ध्वस्त करता हुआ मानो युद्ध के लिए चुनौती देता हुआ आ रहा है।
१३.४
इह वीतभयास्तपोनुभावा-
ज्जहति व्यालमृगाः परेषु वृत्तिम् ।
मयि तां सुतरामयं विधत्ते
विकृतिः किं नु भवेदियं नु माया ॥
ज्जहति व्यालमृगाः परेषु वृत्तिम् ।
मयि तां सुतरामयं विधत्ते
विकृतिः किं नु भवेदियं नु माया ॥
सारांश
AI
अर्जुन ने सोचा कि तपोबल के कारण यहाँ हिंसक पशु भी बैर छोड़ देते हैं, फिर यह मुझ पर आक्रमण क्यों कर रहा है? क्या यह कोई प्राकृतिक विकार है या माया?
१३.५
अथवैष कृतज्ञयेव पूर्वं
भृशमासेवितया रुषा न मुक्तः ।
अवधूय विरोधिनीः किमारा-
न्मृगजातीरभियाति मां जवेन ॥
भृशमासेवितया रुषा न मुक्तः ।
अवधूय विरोधिनीः किमारा-
न्मृगजातीरभियाति मां जवेन ॥
सारांश
AI
अथवा क्या यह अपनी पुरानी शत्रुता के क्रोध को न छोड़ते हुए, अन्य मृगों को नजरअंदाज कर बड़ी तेजी से मेरी ओर ही आ रहा है?
१३.६
न मृगः खलु कोऽप्ययं जिघांसुः
स्खलति ह्यत्र तथा भृशं मनो मे ।
विमलं कलुषीभवच्च चेतः
कथयत्येव हितैषिणं रिपुं वा ॥
स्खलति ह्यत्र तथा भृशं मनो मे ।
विमलं कलुषीभवच्च चेतः
कथयत्येव हितैषिणं रिपुं वा ॥
सारांश
AI
यह निश्चित ही कोई साधारण पशु नहीं अपितु वध का इच्छुक शत्रु है, क्योंकि मेरा निर्मल मन अशांत होकर शत्रु की उपस्थिति का संकेत दे रहा है।
१३.७
मुनिरस्मि निरागसः कुतो मे
भयमित्येष न भूतयेऽभिमानः ।
परवृद्धिषु बद्धमत्सराणां
किमिव ह्यस्ति दुरात्मनामलङ्घ्यम् ॥
भयमित्येष न भूतयेऽभिमानः ।
परवृद्धिषु बद्धमत्सराणां
किमिव ह्यस्ति दुरात्मनामलङ्घ्यम् ॥
सारांश
AI
मुनि होने के कारण मैं निर्भय हूँ, किंतु दूसरों की उन्नति से जलने वाले दुष्टों के लिए कुछ भी अलङ्घ्य नहीं होता।
१३.८
दनुजः स्विदयं क्षपाचरो वा
वनजे नेति बलं बदस्ति सत्त्वे ।
अभिभूय तथा हि मेघनीलः
सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥
वनजे नेति बलं बदस्ति सत्त्वे ।
अभिभूय तथा हि मेघनीलः
सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥
सारांश
AI
क्या यह कोई दानव या राक्षस है? इसके मेघ के समान नीले और बलशाली शरीर ने पर्वतराज को कँपा दिया है।
१३.९
अयमेव मृगव्यसत्त्रकामः
प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे ।
पृथुभिर्ध्वजिनीस्रवैरकार्षी-
च्चकितोद्भ्रान्तमृगाणि काननानि ॥
प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे ।
पृथुभिर्ध्वजिनीस्रवैरकार्षी-
च्चकितोद्भ्रान्तमृगाणि काननानि ॥
सारांश
AI
संभवतः यह छद्म शिकारी मुझ पर मायावी प्रहार करना चाहता है, जिसके भय से वन के पशु व्याकुल होकर इधर-उधर भाग रहे हैं।
१३.१०
बहुशः कृतसत्कृतेर्विधातुं
प्रियमिच्छन्नथवा सुयोधनस्य ।
क्षुभितं वनगोचराभियोगा-
द्गणमाशिश्रियदाकुलं तिरश्चाम् ॥
प्रियमिच्छन्नथवा सुयोधनस्य ।
क्षुभितं वनगोचराभियोगा-
द्गणमाशिश्रियदाकुलं तिरश्चाम् ॥
सारांश
AI
या फिर दुर्योधन का प्रिय करने की इच्छा से यह पशुओं के समूह को क्षुब्ध करता हुआ मुझ पर आक्रमण करने आया है।
१३.११
अवलीढसनाभिरश्वसेनः
प्रसभं खाण्डवजातवेदसा वा ।
प्रतिकर्तुमुपागतः समन्युः
कृतमन्युर्यदि वा वृकोदरेण ॥
प्रसभं खाण्डवजातवेदसा वा ।
प्रतिकर्तुमुपागतः समन्युः
कृतमन्युर्यदि वा वृकोदरेण ॥
सारांश
AI
क्या यह खाण्डव वन के दहन से क्रोधित अश्वसेन नाग है या भीम द्वारा अपमानित कोई शत्रु जो प्रतिशोध लेने आया है?
१३.१२
बलशालितया यथा तथा वा
धियमुच्छेदपरामयं दधानः ।
नियमेन मया निबर्हणीयः
परमं लाभमरातिभङ्गमाहुः ॥
धियमुच्छेदपरामयं दधानः ।
नियमेन मया निबर्हणीयः
परमं लाभमरातिभङ्गमाहुः ॥
सारांश
AI
कारण चाहे जो भी हो, विनाशकारी बुद्धि वाले इस जीव का संहार करना आवश्यक है, क्योंकि शत्रु का नाश ही श्रेष्ठ लाभ माना गया है।
१३.१३
कुरु तात तपांस्यमार्गदायी विजयायेत्यलमन्वशान्मुनिर्माम् । बलिनश्च वधाद् ऋतेऽस्य शक्यं व्रसंरक्षणमन्यथा न कर्तुम् ॥
सारांश
AI
व्यास मुनि ने मुझे तपस्या और विजय का उपदेश दिया था। इस बलशाली जीव के वध के बिना तपोवन की रक्षा संभव नहीं है।
१३.१४
इति तेन विचिन्त्य चापनाम
प्रथमं पौरुषचिह्नमाललम्बे ।
उपलब्धगुणः परस्य भेदे
सचिवः शुद्ध इवाददे च बाणः ॥
प्रथमं पौरुषचिह्नमाललम्बे ।
उपलब्धगुणः परस्य भेदे
सचिवः शुद्ध इवाददे च बाणः ॥
सारांश
AI
ऐसा विचार कर अर्जुन ने पौरुष के प्रतीक धनुष को उठाया और शत्रु-भेदन हेतु एक श्रेष्ठ बाण लिया, जैसे राजा किसी शुद्धहृदय मंत्री का सहयोग लेता है।
१३.१५
अनुभाववता गुरु स्थिरत्वा-
दविसंवादि धनुर्धनंजयेन ।
स्वबलव्यसनेऽपि पीड्यमानं
गुणवन्मित्रमिवानतिं प्रपेदे ॥
दविसंवादि धनुर्धनंजयेन ।
स्वबलव्यसनेऽपि पीड्यमानं
गुणवन्मित्रमिवानतिं प्रपेदे ॥
सारांश
AI
अर्जुन ने अपने स्थिर और प्रभावशाली गाण्डीव धनुष को झुकाया, जिसने पीड़ित होने पर भी गुणवान मित्र की भाँति अर्जुन की आज्ञा स्वीकार की।
१३.१६
प्रविकर्षनिनादभिन्नरन्ध्रः
पदविष्टम्भनिपीडितस्तदानीम् ।
अधिरोहति गाण्डिवं महेषौ
सकलः संशयमारुरोह शैलः ॥
पदविष्टम्भनिपीडितस्तदानीम् ।
अधिरोहति गाण्डिवं महेषौ
सकलः संशयमारुरोह शैलः ॥
सारांश
AI
धनुष की टंकार और अर्जुन के पैरों के दबाव से सारा पर्वत दहल गया और शंका में पड़ गया जब उन्होंने गाण्डीव पर महान बाण चढ़ाया।
१३.१७
ददृशेऽथ सविस्मयं शिवेन
स्थिरपूर्णायतचापमण्डलस्थः ।
रचितस्तिसृणां पुरां विधातुं
वधमात्मेव भयानकः परेषाम् ॥
स्थिरपूर्णायतचापमण्डलस्थः ।
रचितस्तिसृणां पुरां विधातुं
वधमात्मेव भयानकः परेषाम् ॥
सारांश
AI
शिव ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि प्रत्यंचा चढ़ाए हुए अर्जुन ऐसे लग रहे थे मानो त्रिपुरासुर का वध करने हेतु स्वयं शिव का ही कोई भयानक रूप खड़ा हो।
१३.१८
विचकर्ष च संहितेषुरुच्चै-
श्चरणास्कन्दननामिताचलेन्द्रः ।
धनुरायतभोगवासुकिज्या-
वदनग्रन्थिविमुक्तवह्नि शम्भुः ॥
श्चरणास्कन्दननामिताचलेन्द्रः ।
धनुरायतभोगवासुकिज्या-
वदनग्रन्थिविमुक्तवह्नि शम्भुः ॥
सारांश
AI
भगवान शिव ने भी अपना धनुष खींचा, जिसके दबाव से पर्वत झुक गया और वासुकि रूपी प्रत्यंचा के मुख से अग्नि प्रज्वलित हो उठी।
१३.१९
स भवस्य भवक्षयैकहेतोः
सितसप्तेश्च विधास्यतोः सहार्थम् ।
रिपुराप पराभवाय मध्यं
प्रकृतिप्रत्यययोरिवानुबन्धः ॥
सितसप्तेश्च विधास्यतोः सहार्थम् ।
रिपुराप पराभवाय मध्यं
प्रकृतिप्रत्यययोरिवानुबन्धः ॥
सारांश
AI
शिव और अर्जुन दोनों के बाणों के मध्य वह शत्रु उसी प्रकार आ गया जैसे व्याकरण में प्रकृति और प्रत्यय के बीच कोई अनुबंध आ जाता है।
१३.२०
अथ दीपितवारिवाहवर्त्मा रववित्रासितवारणादवार्यः । निपपात जवादिषु पिनाकान्महतोऽभ्रादिव वैद्युतः कृशानुः ॥
सारांश
AI
फिर पिनाक धनुष से बिजली की तरह चमकता हुआ वह बाण वेग से निकला, जिसने आकाश को आलोकित किया और हाथियों को भयभीत कर दिया।
१३.२१
व्रजतोऽस्य बृहत्पतत्त्रजन्मा
कृततार्क्ष्योपनिपातवेगशङ्कः ।
प्रतिनादमहान्महोरगाणां
हृदयश्रोत्रभिदुत्पपात नादः ॥
कृततार्क्ष्योपनिपातवेगशङ्कः ।
प्रतिनादमहान्महोरगाणां
हृदयश्रोत्रभिदुत्पपात नादः ॥
सारांश
AI
अर्जुन के बाण के वेग से गरुड़ के झपट्टे का भ्रम हुआ, जिससे साँपों के हृदय और कानों को दहला देने वाली भीषण प्रतिध्वनि गूँज उठी।
१३.२२
नयनादिव शूलिनः प्रवृत्तै-
र्मनसोऽप्याशुतरं यतः पिशङ्गैः ।
विदधे विलसत्तडिल्लताभैः
किरणैर्व्योमनि मार्गणस्य मार्गः ॥
र्मनसोऽप्याशुतरं यतः पिशङ्गैः ।
विदधे विलसत्तडिल्लताभैः
किरणैर्व्योमनि मार्गणस्य मार्गः ॥
सारांश
AI
शिव के नेत्रों की अग्नि के समान और बिजली जैसी चमक वाली किरणों से युक्त उस बाण ने मन से भी तेज गति से आकाश में मार्ग बनाया।
१३.२३
अपयन्धनुषः शिवान्तिकस्थै-
र्विवरेसद्भिरभिख्यया जिहानः ।
युगपद्ददृशे विशन्वराहं
तदुपोढैश्च नभश्चरैः पृषत्कः ॥
र्विवरेसद्भिरभिख्यया जिहानः ।
युगपद्ददृशे विशन्वराहं
तदुपोढैश्च नभश्चरैः पृषत्कः ॥
सारांश
AI
धनुष से निकलते ही वह तेजस्वी बाण आकाश में स्थित देवताओं द्वारा एक साथ वराह के शरीर में प्रवेश करते हुए देखा गया।
१३.२४
स तमालनिभे रिपौ सुराणां
घननीहार इवाविषक्तवेगः ।
भयविप्लुतमीक्षितो नभःस्थै-
र्जगतीं ग्राह इवापगां जगाहे ॥
घननीहार इवाविषक्तवेगः ।
भयविप्लुतमीक्षितो नभःस्थै-
र्जगतीं ग्राह इवापगां जगाहे ॥
सारांश
AI
तमाल वृक्ष जैसे काले वराह में वह बाण कोहरे की तरह बिना रुके समा गया, जिसे आकाश स्थित देवों ने नदी में पैठते मगरमच्छ जैसा देखा।
१३.२५
सपदि प्रियरूपपर्वरेखः
सितलोहाग्रनखः खमाससाद ।
कुपितान्तकतर्जनाङ्गुलिश्री-
र्व्यथयन्प्राणभृतः कपिध्वजेषु ॥
सितलोहाग्रनखः खमाससाद ।
कुपितान्तकतर्जनाङ्गुलिश्री-
र्व्यथयन्प्राणभृतः कपिध्वजेषु ॥
सारांश
AI
सुंदर रेखाओं और लोहे के तीखे अग्रभाग वाले उस बाण ने यमराज की क्रोधित तर्जनी के समान आकाश में चमकते हुए प्राणियों को भयभीत किया।
१३.२६
परमास्त्रपरिग्रहोरुतेजः
स्फुरदुल्काकृति विक्षिपन्वनेषु ।
स जवेन पतन्परःशतानां
पततां व्रात इवारवं वितेने ॥
स्फुरदुल्काकृति विक्षिपन्वनेषु ।
स जवेन पतन्परःशतानां
पततां व्रात इवारवं वितेने ॥
सारांश
AI
अस्त्र के तेज से प्रज्वलित वह बाण गिरती उल्का की तरह चमक बिखेरते हुए और सैकड़ों गिरते पक्षियों के शोर के समान ध्वनि करता हुआ वेग से गिरा।
१३.२७
अविभावितनिष्क्रमप्रयाणः
शमितायाम इवातिरंहसा सः ।
सह पूर्वतरं नु चित्तवृत्ते-
रपतित्वा नु चकार लक्ष्यभेदम् ॥
शमितायाम इवातिरंहसा सः ।
सह पूर्वतरं नु चित्तवृत्ते-
रपतित्वा नु चकार लक्ष्यभेदम् ॥
सारांश
AI
अपनी अतिशय गति के कारण अदृश्य रहते हुए उस बाण ने मानो संकल्प मात्र से ही लक्ष्य को भेद दिया।
१३.२८
स वृषध्वजसायकावभिन्नं
जयहेतुः प्रतिकायमेषणीयम् ।
लघु साधयितुं शरः प्रसेहे
विधिनेवार्थमुदीरितं प्रयत्नः ॥
जयहेतुः प्रतिकायमेषणीयम् ।
लघु साधयितुं शरः प्रसेहे
विधिनेवार्थमुदीरितं प्रयत्नः ॥
सारांश
AI
शिव के बाण के साथ अर्जुन के बाण ने वराह को वैसे ही भेदा जैसे विधि के अनुकूल किया गया प्रयत्न फल को सुगमता से सिद्ध करता है।
१३.२९
अविवेकवृथाश्रमाविवार्थं
क्षयलोभाविव संश्रितानुरागम् ।
विजिगीषुमिवानयप्रमादा-
ववसादं विशिखौ विनिन्यतुस्तम् ॥
क्षयलोभाविव संश्रितानुरागम् ।
विजिगीषुमिवानयप्रमादा-
ववसादं विशिखौ विनिन्यतुस्तम् ॥
सारांश
AI
जैसे अज्ञान और व्यर्थ श्रम संपत्ति का नाश करते हैं, वैसे ही उन दोनों बाणों ने उस वराह के प्राणों का अंत कर दिया।
१३.३०
अथ दीर्घतमं तमः प्रवेक्ष्यन्सहसा रुग्ण्रयः स सम्भ्रमेण । निपतन्तमिवोष्णरश्मिमुर्व्यां वलयीभूततरुं धरां च मेने ॥
सारांश
AI
प्राण त्यागते समय घायल वराह को ऐसा लगा मानो सूर्य पृथ्वी पर गिर रहा हो और दिशाएं मंडल बनकर घूम रही हों।
१३.३१
स गतः क्षितिमुष्णशोणितार्द्रः
खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणमीक्षितेन्द्रसूनि-
र्विहितामर्षगुरुध्वनिर्निरासे ॥
खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणमीक्षितेन्द्रसूनि-
र्विहितामर्षगुरुध्वनिर्निरासे ॥
सारांश
AI
रक्त से लथपथ और पत्थरों को चीरता हुआ वह वराह भीषण गर्जना के साथ अर्जुन को देखते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।
१३.३२
स्फुटपौरुषमापपात पार्थ-
स्तमथ प्राज्यशरः शरं जिघृक्षुः ।
न तथा कृतवेदिनां करिष्य-
न्प्रियतामेति यथा कृतावदानः ॥
स्तमथ प्राज्यशरः शरं जिघृक्षुः ।
न तथा कृतवेदिनां करिष्य-
न्प्रियतामेति यथा कृतावदानः ॥
सारांश
AI
अपना पुरुषार्थ सिद्ध कर अर्जुन बाण लेने पहुँचे; क्योंकि केवल कृतज्ञ होने की अपेक्षा महान कार्य सिद्ध करने वाला वीर अधिक प्रिय होता है।
१३.३३
उपकार इवासति प्रयुक्तः
स्थितिमप्राप्य मृगे गतः प्रणाशम् ।
कृतशक्तिरवाङ्मुखो गुरुत्वा-
ज्जनितव्रीड इवात्मपौरुषेण ॥
स्थितिमप्राप्य मृगे गतः प्रणाशम् ।
कृतशक्तिरवाङ्मुखो गुरुत्वा-
ज्जनितव्रीड इवात्मपौरुषेण ॥
सारांश
AI
दुर्जन पर किए उपकार की भाँति वह बाण वराह के शरीर को पार कर, मानो अपने पौरुष से लज्जित होकर भूमि में समा गया।
१३.३४
स समुद्धरता विचिन्त्य तेन
स्वरुचं कीर्तिमिवोत्तमां दधानः ।
अनुयुक्त इव स्ववार्तमुच्चैः
परिरेभे नु भृशं विलोचनाभ्याम् ॥
स्वरुचं कीर्तिमिवोत्तमां दधानः ।
अनुयुक्त इव स्ववार्तमुच्चैः
परिरेभे नु भृशं विलोचनाभ्याम् ॥
सारांश
AI
अर्जुन ने कीर्ति की तरह चमकते उस बाण को निकाला और बड़े अनुराग से उसे निहारा, मानो वे नेत्रों से उसका आलिंगन कर रहे हों।
१३.३५
तत्र कार्मुकभृतं महाभुजः
पश्यति स्म सहसा वनेचरम् ।
संनिकाशयितुमग्रतः स्थितं
शासनं कुसुमचापविद्विषः ॥
पश्यति स्म सहसा वनेचरम् ।
संनिकाशयितुमग्रतः स्थितं
शासनं कुसुमचापविद्विषः ॥
सारांश
AI
वहाँ अर्जुन ने अचानक एक किरात को देखा, जो भगवान शिव की आज्ञा को मूर्तरूप देने के लिए उनके सामने खड़ा था।
१३.३६
स प्रयुज्य तनये महीपते-
रात्मजातिसदृशीं किलानतिम् ।
सान्त्वपूर्वमभिनीतिहेतुकं
वक्तुमित्थमुपचक्रमे वचः ॥
रात्मजातिसदृशीं किलानतिम् ।
सान्त्वपूर्वमभिनीतिहेतुकं
वक्तुमित्थमुपचक्रमे वचः ॥
सारांश
AI
उस किरात ने राजकुमार अर्जुन को अपनी जाति के अनुरूप प्रणाम किया और अत्यंत सौम्यता से अपनी बात कहना प्रारंभ किया।
१३.३७
शान्तता विनययोगि मानसं
भूरिधाम विमलं तपः श्रुतम् ।
प्राह ते नु सदृशी दिवौकसा-
मन्ववायमवदातमाकृतिः ॥
भूरिधाम विमलं तपः श्रुतम् ।
प्राह ते नु सदृशी दिवौकसा-
मन्ववायमवदातमाकृतिः ॥
सारांश
AI
आपकी शांति, विनम्रता, तेज और पवित्र तप आपके देवताओं जैसे महान और निष्कलंक वंश का परिचय दे रहे हैं।
१३.३८
दीपितस्त्वमनुभावसम्पदा
गौरवेण लघयन्महीभृतः ।
राजसे मुनिरपीह कारय-
न्नाधिपत्यमिव शातमन्यवम् ॥
गौरवेण लघयन्महीभृतः ।
राजसे मुनिरपीह कारय-
न्नाधिपत्यमिव शातमन्यवम् ॥
सारांश
AI
अपने प्रभाव से पर्वतों को लघु करते हुए आप मुनि वेश में भी इंद्र के समान ऐश्वर्यशाली प्रतीत हो रहे हैं।
१३.३९
तापसोऽपि विभुतामुपेयिवा-
नास्पदं त्वमसि सर्वसम्पदाम् ।
दृश्यते हि भवतो विना जनै-
रन्वितस्य सचिवैरिव द्युतिः ॥
नास्पदं त्वमसि सर्वसम्पदाम् ।
दृश्यते हि भवतो विना जनै-
रन्वितस्य सचिवैरिव द्युतिः ॥
सारांश
AI
तपस्वी होते हुए भी आप समस्त संपदाओं के केंद्र हैं; आपकी कांति मंत्रियों के बिना भी वैसी ही है जैसी मंत्रियों के साथ होती है।
१३.४०
विस्मयः क इव वा जयश्रिया
नैव मुक्तिरपि ते दवीयसी ।
ईप्सितस्य न भवेदुपाश्रयः
कस्य निर्जितरजस्तमोगुणः ॥
नैव मुक्तिरपि ते दवीयसी ।
ईप्सितस्य न भवेदुपाश्रयः
कस्य निर्जितरजस्तमोगुणः ॥
सारांश
AI
रज और तम गुणों को जीतने वाले आपके लिए विजय या मोक्ष कुछ भी दुर्लभ नहीं है; आपके समस्त मनोरथ सहज ही सिद्ध होने योग्य हैं।
१३.४१
ह्रेपयन्नहिमतेजसं त्विषा
स त्वमित्थमुपपन्नपौरुषः ।
हर्तुमर्हसि वराहभेदिनं
नैनमस्मदधिपस्य सायकम् ॥
स त्वमित्थमुपपन्नपौरुषः ।
हर्तुमर्हसि वराहभेदिनं
नैनमस्मदधिपस्य सायकम् ॥
सारांश
AI
अपनी कान्ति से सूर्य को भी लज्जित करने वाले और पराक्रम से संपन्न आप हमारे स्वामी के उस बाण को ग्रहण न करें जिसने वराह का वध किया है।
१३.४२
स्मर्यते तनुभृतां सनातनं
न्याय्यमाचरितमुत्तमैर्नृभिः ।
ध्वंसते यदि भवादृशस्ततः
कः प्रयातु वद तेन वर्त्मना ॥
न्याय्यमाचरितमुत्तमैर्नृभिः ।
ध्वंसते यदि भवादृशस्ततः
कः प्रयातु वद तेन वर्त्मना ॥
सारांश
AI
श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा किए गए न्यायपूर्ण आचरण को ही शाश्वत मर्यादा माना जाता है। यदि आप जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति ही मर्यादा का उल्लंघन करेंगे, तो अन्य लोग किस मार्ग का अनुसरण करेंगे?
१३.४३
आकुमारमुपदेष्टुमिच्छवः
संनिवृत्तिमपथान्महापदः ।
योगशक्तिजितजन्ममृत्यवः
शीलयन्ति यतयः सुशीलताम् ॥
संनिवृत्तिमपथान्महापदः ।
योगशक्तिजितजन्ममृत्यवः
शीलयन्ति यतयः सुशीलताम् ॥
सारांश
AI
योगशक्ति से जन्म और मृत्यु पर विजय पाने वाले योगी पुरुष बालकों को भी अधर्म के मार्ग से निवृत्त करने के लिए स्वयं उत्तम आचरण का अभ्यास करते हैं।
१३.४४
तिष्ठतां तपसि पुण्यमासज-
न्सम्पदोऽनुगुणयन्सुखैषिणाम् ।
योगिनां परिणमन्विमुक्तये
केन नास्तु विनयः सतां प्रियः ॥
न्सम्पदोऽनुगुणयन्सुखैषिणाम् ।
योगिनां परिणमन्विमुक्तये
केन नास्तु विनयः सतां प्रियः ॥
सारांश
AI
सज्जनों की विनयशीलता सबको प्रिय क्यों न हो? यह तपस्वियों को पुण्य, सुख चाहने वालों को अनुकूल संपत्ति और योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।
१३.४५
नूनमत्रभवतः शराकृतिं
सर्वथायमनुयाति सायकः ।
सोऽयमित्यनुपपन्नसंशयः
कारितस्त्वमपथे पदं यया ॥
सर्वथायमनुयाति सायकः ।
सोऽयमित्यनुपपन्नसंशयः
कारितस्त्वमपथे पदं यया ॥
सारांश
AI
निश्चित ही यह बाण सर्वांश में आपके बाण के समान दिखता है। इसी समानता के कारण उत्पन्न हुए भ्रम ने ही आपसे मर्यादा के विरुद्ध यह कदम उठवाया है।
१३.४६
अन्यदीयविशिखे न केवलं
निःस्पृहस्य भवितव्यमाहृते ।
निघ्नतः परनिबर्हितं मृगं
व्रीडितव्यमपि ते सचेतसः ॥
निःस्पृहस्य भवितव्यमाहृते ।
निघ्नतः परनिबर्हितं मृगं
व्रीडितव्यमपि ते सचेतसः ॥
सारांश
AI
आपको न केवल दूसरे के बाण की इच्छा नहीं करनी चाहिए, बल्कि किसी दूसरे द्वारा मारे गए शिकार को अपना बताने में आप जैसे चेतनाशील व्यक्ति को लज्जा आनी चाहिए।
१३.४७
संततं निशमयन्त उत्सुका
यैः प्रयान्ति मुदमस्य सूरयः ।
कीर्तितानि हसितेऽपि तानि यं
व्रीडयन्ति चरितानि मानिनम् ॥
यैः प्रयान्ति मुदमस्य सूरयः ।
कीर्तितानि हसितेऽपि तानि यं
व्रीडयन्ति चरितानि मानिनम् ॥
सारांश
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विद्वान लोग उन चरित्रों को उत्सुकता से सुनते हैं जिनसे प्रसन्नता मिलती है, किंतु मिथ्या प्रशंसा किए जाने पर स्वाभिमानी व्यक्ति हंसी-मजाक में भी लज्जित हो जाता है।
१३.४८
अन्यदोषमिव सः स्वकं गुणं
ख्यापयेत्कथमधृष्टताजडः ।
उच्यते स खलु कार्यवत्तया
धिग्विभिन्नबुधसेतुमर्थिताम् ॥
ख्यापयेत्कथमधृष्टताजडः ।
उच्यते स खलु कार्यवत्तया
धिग्विभिन्नबुधसेतुमर्थिताम् ॥
सारांश
AI
कोई निर्लज्ज ही दूसरे के दोष को अपना गुण बता सकता है। स्वार्थ के वशीभूत होकर ऐसी याचना करना विद्वानों द्वारा स्थापित मर्यादा के सेतु को नष्ट करने के समान है।
१३.४९
दुर्वचं तदथ मा स्म भून्मृग-
स्त्वावसौ यदकरिष्यदोजसा ।
नैनमाशु यदि वाहिनीपतिः
प्रत्यपत्स्यत शितेन पत्त्रिणा ॥
स्त्वावसौ यदकरिष्यदोजसा ।
नैनमाशु यदि वाहिनीपतिः
प्रत्यपत्स्यत शितेन पत्त्रिणा ॥
सारांश
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यह कहना कठिन है कि वह पराक्रमी वराह क्या अनर्थ कर देता, यदि हमारे सेनापति ने शीघ्रता से अपने तीक्ष्ण बाण से उसे धराशायी न किया होता।
१३.५०
को न्विमं हरितुरङ्गमायुध-
स्थेयसीं दधतमङ्गसंहतिम् ।
वेगवत्तरमृते चमूपते-
र्हन्तुमर्हति शरेण दंष्ट्रिणम् ॥
स्थेयसीं दधतमङ्गसंहतिम् ।
वेगवत्तरमृते चमूपते-
र्हन्तुमर्हति शरेण दंष्ट्रिणम् ॥
सारांश
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इन्द्र के वज्र के समान कठोर शरीर वाले और अत्यंत वेगवान इस वराह को सेनापति के अतिरिक्त और कौन अपने बाण से मारने में समर्थ हो सकता था?
॥ इति त्रयोदशः सर्गः ॥
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