सारांश
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निश्चित ही यह बाण सर्वांश में आपके बाण के समान दिखता है। इसी समानता के कारण उत्पन्न हुए भ्रम ने ही आपसे मर्यादा के विरुद्ध यह कदम उठवाया है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
नूनमिति।अयमस्मदीयः सायकोऽत्रभवतः । पूज्यस्येत्यर्थः । 'पूज्यस्तत्रभवानत्रभवान्' इति सज्जनः ।
इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते (अष्टाध्यायी ५.३.१४ ) इति सार्वविभक्तिकस्तसिल्प्रत्ययः। सुप्सुपेति समासः। शराकृतिं सर्वथा रूपेण रेखादिना सर्वप्रकारेणानुयात्यनुसरति । अत्यन्तमनुकरोतीत्यर्थः । नूनमिति वितर्के । ययाकृत्या कर्त्र्या त्वमनुपपन्नसंशयोऽत्यन्तसादृश्यादनुत्पन्नस्वान्यदीयत्वसंदेहः सन्। सोऽयमिति यः स्वकीयः स एवायमिति भ्रान्त्युत्पत्त्यैवेति शेषः। अपथेऽमार्गे शरापहरणरूपे पदं कारितः । निधापित इत्यर्थः। 'हक्रोरन्यतरस्याम्' इत्यणि कर्तुः कर्मता । ण्यन्ते कर्तुश्च कर्मणः' इति तत्रैवाभिहिते कर्मणि क्तः॥ पुनरपि स्तेयमेव द्रढयन्दोषान्तरमापादयति
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नू | न | म | त्र | भ | व | तः | श | रा | कृ | तिं |
| स | र्व | था | य | म | नु | या | ति | सा | य | कः |
| सो | ऽय | मि | त्य | नु | प | प | न्न | सं | श | यः |
| का | रि | त | स्त्व | म | प | थे | प | दं | य | या |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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