स्मर्यते तनुभृतां सनातनं
न्याय्यमाचरितमुत्तमैर्नृभिः ।
ध्वंसते यदि भवादृशस्ततः
कः प्रयातु वद तेन वर्त्मना ॥
स्मर्यते तनुभृतां सनातनं
न्याय्यमाचरितमुत्तमैर्नृभिः ।
ध्वंसते यदि भवादृशस्ततः
कः प्रयातु वद तेन वर्त्मना ॥
न्याय्यमाचरितमुत्तमैर्नृभिः ।
ध्वंसते यदि भवादृशस्ततः
कः प्रयातु वद तेन वर्त्मना ॥
सारांश
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श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा किए गए न्यायपूर्ण आचरण को ही शाश्वत मर्यादा माना जाता है। यदि आप जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति ही मर्यादा का उल्लंघन करेंगे, तो अन्य लोग किस मार्ग का अनुसरण करेंगे?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स्मर्यत इति ॥ उत्तमैर्नृभिः सत्पुरुषैर्मन्वादिभिस्तनुभृतां शरीरिणां सनाननं नित्यं न्याय्यं न्यायादनपेतमाचरितमाचारः स्मर्यते।कर्तव्यतयेति शेषः।न त्वनाचार इत्यर्थः। अथाप्यनाचरणे दोषमाह—ध्वंसत इति । भवानिव दृश्यते भवादृशस्ततः सदाचाराद्ध्वम्सते भ्रश्यते यदि तदा तेन वर्त्मना न्यायमार्गेण क: प्रयातु गच्छतु वद कथय । न कोऽपीत्यर्थः । तथा च सन्मार्ग एव खिलः स्यादिति भावः ॥
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र्य | ते | त | नु | भृ | तां | स | ना | त | नं |
| न्या | य्य | मा | च | रि | त | मु | त्त | मै | र्नृ | भिः |
| ध्वं | स | ते | य | दि | भ | वा | दृ | श | स्त | तः |
| कः | प्र | या | तु | व | द | ते | न | व | र्त्म | ना |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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