स गतः क्षितिमुष्णशोणितार्द्रः
खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणमीक्षितेन्द्रसूनि-
र्विहितामर्षगुरुध्वनिर्निरासे ॥
स गतः क्षितिमुष्णशोणितार्द्रः
खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणमीक्षितेन्द्रसूनि-
र्विहितामर्षगुरुध्वनिर्निरासे ॥
खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणमीक्षितेन्द्रसूनि-
र्विहितामर्षगुरुध्वनिर्निरासे ॥
सारांश
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रक्त से लथपथ और पत्थरों को चीरता हुआ वह वराह भीषण गर्जना के साथ अर्जुन को देखते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ क्षितिं गतः क्षितौ पतित उष्णेन प्रत्यग्रत्वाच्छोणितेनार्द्र: प्लुतः खुराणां दंष्ट्रयोश्चाग्राणां निपातेनाघातेन दारिताश्मा पाटितपाषाणः।किंच।क्षणमीक्षितेन्द्रसूनुः। स्वार्थविघतरोषादिति भावः । अत एव विहितः कृतोऽमर्षगुरुः क्रोधोद्धत्तो ध्वनिः क्रन्दितं येन स तथोक्तः स वराहोऽसुभिः प्राणैर्निरासे निरस्तः । त्यक्त इत्यर्थः । अस्यतेः कर्मणि लिट् । इयं च स्वभावोक्तिः ।
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ग | तः | क्षि | ति | मु | ष्ण | शो | णि | ता | र्द्रः | |
| खु | र | दं | ष्ट्रा | ग्र | नि | पा | त | दा | रि | ता | श्मा |
| अ | सु | भिः | क्ष | ण | मी | क्षि | ते | न्द्र | सू | नि | |
| र्वि | हि | ता | म | र्ष | गु | रु | ध्व | नि | र्नि | रा | से |
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