अविभावितनिष्क्रमप्रयाणः
शमितायाम इवातिरंहसा सः ।
सह पूर्वतरं नु चित्तवृत्ते-
रपतित्वा नु चकार लक्ष्यभेदम् ॥
अविभावितनिष्क्रमप्रयाणः
शमितायाम इवातिरंहसा सः ।
सह पूर्वतरं नु चित्तवृत्ते-
रपतित्वा नु चकार लक्ष्यभेदम् ॥
शमितायाम इवातिरंहसा सः ।
सह पूर्वतरं नु चित्तवृत्ते-
रपतित्वा नु चकार लक्ष्यभेदम् ॥
सारांश
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अपनी अतिशय गति के कारण अदृश्य रहते हुए उस बाण ने मानो संकल्प मात्र से ही लक्ष्य को भेद दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अविभावितेति ॥ अतिरंहसातिवेगेनाविभावितेऽलक्षिते निष्क्रमो गाण्डीवान्निःसरणं प्रयाणमन्तरागमनं च यस्य सः। तथा शमितायामः संक्षिप्तदैर्घ्य इव स्थित इत्युपात्तवेगगुणनिमित्ता दैर्ध्य गुणाभावोत्प्रेक्षा। स शरः। सह नु सह वा। चित्तवृत्त्येति शेषः। चित्तवृत्तेः पूर्वतरं नु प्रागेव वा । उभयत्रापि लक्ष्ये । पतित्वेति शेषः । अथवापतित्वा नु । लक्ष्य इति शेषः । लक्ष्यभेदं चकार । अत्रोपात्तवेगगुणनिमित्ताद्बाणस्य चित्सवृत्त्या सहपातपूर्वपातपतनाभावोत्प्रेक्षास्तिस्त्र उत्तरोत्तरोत्कर्षेण वेगातिशयव्यञ्जिका इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः॥
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वि | भा | वि | त | नि | ष्क्र | म | प्र | या | णः | |
| श | मि | ता | या | म | इ | वा | ति | रं | ह | सा | सः |
| स | ह | पू | र्व | त | रं | नु | चि | त्त | वृ | त्ते | |
| र | प | ति | त्वा | नु | च | का | र | ल | क्ष्य | भे | दम् |
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