दनुजः स्विदयं क्षपाचरो वा
वनजे नेति बलं बदस्ति सत्त्वे ।
अभिभूय तथा हि मेघनीलः
सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥
दनुजः स्विदयं क्षपाचरो वा
वनजे नेति बलं बदस्ति सत्त्वे ।
अभिभूय तथा हि मेघनीलः
सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥
वनजे नेति बलं बदस्ति सत्त्वे ।
अभिभूय तथा हि मेघनीलः
सकलं कम्पयतीव शैलराजम् ॥
अन्वयः
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अयम् दनुजः स्वित् वा क्षपाचरः? वनजे सत्त्वे (एतादृशं) बलम् न (भवति) इति (मे मनः) वदति। हि तथा मेघनीलः (सन्) सकलम् शैलराजम् अभिभूय कम्पयति इव।
English Summary
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'Is this a demon, or perhaps a night-wanderer? My mind tells me that such strength is not found in a forest creature. For, dark as a cloud, it seems to overpower and shake the entire king of mountains.'
सारांश
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क्या यह कोई दानव या राक्षस है? इसके मेघ के समान नीले और बलशाली शरीर ने पर्वतराज को कँपा दिया है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दनुज इति ॥ अयं दनुजः स्विद्दानवो वा क्षपाचरो राक्षसो वा । न तु मृग एवेत्यर्थः। कुतः। वनजे सत्त्वे वन्यप्राणिनीतीदृशं बलं नास्ति। वतेत्याश्चर्ये। वलमेव समर्थयते। तथा हि । मेघनीलोऽयं वराहः सकलं शैलराजमभिभूयाक्रम्य कम्पयतीव।पदविष्टम्भभरात्तथा प्रतीयत इत्यर्थः । अत्र कम्पयतीवेत्युत्प्रेक्षागर्भोऽयं शैलकम्पनरूपकार्येण तत्कारणबलातिरेकसमर्थनात्कार्येण कारणसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः॥ किं च। योऽयं शैले मृगयाकलकल इव श्रूयते सोऽप्येतन्मायापरिकल्पित एवेत्याहअयमेव मृगव्यसत्रकामः प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे। पृथुभिर्ध्वजिनीरवैरकार्षीच्चकितोद्भान्तमृगाणि काननानि
पदच्छेदः
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| दनुजः | दनुज (१.१) | A demon |
| स्वित् | स्वित् | perhaps |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| क्षपाचरः | क्षपाचर (१.१) | a night-wanderer (Rakshasa) |
| वा | वा | or |
| वनजे | वनज (७.१) | in a forest-born |
| न | न | not |
| इति | इति | thus |
| बलम् | बल (१.१) | strength |
| वदति | वदति (√वद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | it says |
| सत्त्वे | सत्त्व (७.१) | in a creature |
| अभिभूय | अभिभूय (अभि√भू+ल्यप्) | having overpowered |
| तथा | तथा | so |
| हि | हि | for |
| मेघनीलः | मेघ–नील (१.१) | dark as a cloud |
| सकलम् | सकल (२.१) | the entire |
| कम्पयति | कम्पयति (√कम्प् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | causes to tremble |
| इव | इव | as if |
| शैलराजम् | शैलराज (२.१) | the king of mountains |
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | नु | जः | स्वि | द | यं | क्ष | पा | च | रो | वा | |
| व | न | जे | ने | ति | ब | लं | ब | द | स्ति | स | त्त्वे |
| अ | भि | भू | य | त | था | हि | मे | घ | नी | लः | |
| स | क | लं | क | म्प | य | ती | व | शै | ल | रा | जम् |
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