सारांश
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आपको न केवल दूसरे के बाण की इच्छा नहीं करनी चाहिए, बल्कि किसी दूसरे द्वारा मारे गए शिकार को अपना बताने में आप जैसे चेतनाशील व्यक्ति को लज्जा आनी चाहिए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अन्यदीयेति ॥ सह चेतसा वर्तत इति सचेतास्तस्य मनस्विनस्तेऽन्यदीयविशिखे विषये यदाहृतमाहरणम् । भावे क्तः। तस्मिन् । अन्यदीयविशिखस्याहरण इत्यर्थः । निःस्पृहस्य केवलं निःस्पृहेणैव न भवितव्यम् । किंतु परनिबर्हितं परेण प्रहृतं मृगं निघ्नतः प्रहरतस्ते । निघ्नता त्वयेत्यर्थः ।
कृत्यानां कर्तरि वा (अष्टाध्यायी २.३.७१ ) इति षष्ठी। व्रीडितव्यं लज्जितव्यमपि । भावे तव्यप्रत्ययः। संप्रति तु त्वया परविद्धं मृगं विद्धवापि न व्रीड्यते प्रत्युत स्तेयमेव क्रियत इत्यहो महत्साहसमित्यर्थः । मृगमित्यत्रः शेषत्वाविवक्षणात् जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम् (अष्टाध्यायी २.३.५६ ) इति षष्ठी न भवति शेषाधिकारात् । निप्रहणेत्यत्र निप्रयोः संघातव्यस्तविपर्यस्तानां ग्रहणात् ॥ अथास्मिन्कृतघ्रताभियोगाय स्वीयोपकारकत्वं वर्णयितुं विकत्थनदोषं तावद्युग्मेन परिहरन्नाह—
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | न्य | दी | य | वि | शि | खे | न | के | व | लं |
| निः | स्पृ | ह | स्य | भ | वि | त | व्य | मा | हृ | ते |
| नि | घ्न | तः | प | र | नि | ब | र्हि | तं | मृ | गं |
| व्री | डि | त | व्य | म | पि | ते | स | चे | त | सः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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