संततं निशमयन्त उत्सुका
यैः प्रयान्ति मुदमस्य सूरयः ।
कीर्तितानि हसितेऽपि तानि यं
व्रीडयन्ति चरितानि मानिनम् ॥
संततं निशमयन्त उत्सुका
यैः प्रयान्ति मुदमस्य सूरयः ।
कीर्तितानि हसितेऽपि तानि यं
व्रीडयन्ति चरितानि मानिनम् ॥
यैः प्रयान्ति मुदमस्य सूरयः ।
कीर्तितानि हसितेऽपि तानि यं
व्रीडयन्ति चरितानि मानिनम् ॥
सारांश
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विद्वान लोग उन चरित्रों को उत्सुकता से सुनते हैं जिनसे प्रसन्नता मिलती है, किंतु मिथ्या प्रशंसा किए जाने पर स्वाभिमानी व्यक्ति हंसी-मजाक में भी लज्जित हो जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संततमित्यादि ॥ सूरयो विद्वांसोऽस्यात्मत्स्वामिनः संबन्धिभिर्यैश्चरितैः करणभूतैः संततं सततमुत्सुकाः सोत्कण्ठाः सन्तो निशमयन्तश्चरितानि शृण्वन्तो मुदं प्रयान्ति । अत्र चरितानां मुत्प्राप्तौ शाब्दं करणत्वम् । अर्थान्निशमनकर्मत्वमिति विवेकः । तानि चरितानि हसितेऽपि परिहासेऽपि कीर्तितानि परैरुच्चारितानि सन्ति यं मानिनं व्रीडयन्ति। मानित्वाद्व्रीडा न तु चरितदोषात् । तेषामलंकाररूपत्वादिति भावः ॥
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | त | तं | नि | श | म | य | न्त | उ | त्सु | का |
| यैः | प्र | या | न्ति | मु | द | म | स्य | सू | र | यः |
| की | र्ति | ता | नि | ह | सि | ते | ऽपि | ता | नि | यं |
| व्री | ड | य | न्ति | च | रि | ता | नि | मा | नि | नम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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