स प्रयुज्य तनये महीपते-
रात्मजातिसदृशीं किलानतिम् ।
सान्त्वपूर्वमभिनीतिहेतुकं
वक्तुमित्थमुपचक्रमे वचः ॥
स प्रयुज्य तनये महीपते-
रात्मजातिसदृशीं किलानतिम् ।
सान्त्वपूर्वमभिनीतिहेतुकं
वक्तुमित्थमुपचक्रमे वचः ॥
रात्मजातिसदृशीं किलानतिम् ।
सान्त्वपूर्वमभिनीतिहेतुकं
वक्तुमित्थमुपचक्रमे वचः ॥
सारांश
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उस किरात ने राजकुमार अर्जुन को अपनी जाति के अनुरूप प्रणाम किया और अत्यंत सौम्यता से अपनी बात कहना प्रारंभ किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ स वनेचरो महीपतेस्तनये राजपुत्रेऽर्जुन आत्मजातिसदृशीं किरातजात्यनुरूपां किल । किलेति जातेरलीकतां दर्शयति । यतः। परमार्थतः प्रथम एव सः । आनतिं प्रणतिं प्रयुज्य सान्त्वपूर्वं सामपूर्वकम् ।
साम सान्त्वमुभे समे इत्यमरः। अभिनीतिहेतुकं प्रिययुक्तिहेतुकं वचः। इत्थं वक्ष्यमाणप्रकारेण वक्तुमुपचक्रम उपक्रान्तवान्। तत्र तावश्चतुर्भिः सान्त्वमाह
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प्र | यु | ज्य | त | न | ये | म | ही | प | ते |
| रा | त्म | जा | ति | स | दृ | शीं | कि | ला | न | तिम् |
| सा | न्त्व | पू | र्व | म | भि | नी | ति | हे | तु | कं |
| व | क्तु | मि | त्थ | मु | प | च | क्र | मे | व | चः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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