तापसोऽपि विभुतामुपेयिवा-
नास्पदं त्वमसि सर्वसम्पदाम् ।
दृश्यते हि भवतो विना जनै-
रन्वितस्य सचिवैरिव द्युतिः ॥
तापसोऽपि विभुतामुपेयिवा-
नास्पदं त्वमसि सर्वसम्पदाम् ।
दृश्यते हि भवतो विना जनै-
रन्वितस्य सचिवैरिव द्युतिः ॥
नास्पदं त्वमसि सर्वसम्पदाम् ।
दृश्यते हि भवतो विना जनै-
रन्वितस्य सचिवैरिव द्युतिः ॥
सारांश
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तपस्वी होते हुए भी आप समस्त संपदाओं के केंद्र हैं; आपकी कांति मंत्रियों के बिना भी वैसी ही है जैसी मंत्रियों के साथ होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तापस इति । विभुतां प्रभावमुपेयिवानुपगतः । अतएव तापसोऽपि त्वं सर्वसंपदामास्पदं स्थानमसि ।
आस्पदं प्रतिष्ठायाम् (अष्टाध्यायी ६.१.१४६ ) इति निपातः। विभुतामेव समर्थयतेतथाहि भवतस्तव जनैर्विनापि । एकाकिनोऽपीत्यर्थः । सचिवैरन्वितस्येवामात्यादियुक्तस्येव द्युतिस्तेजो दृश्यते । अतः सर्वसंपदामास्पदत्वं युक्तमित्यर्थः ॥
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | प | सो | ऽपि | वि | भु | ता | मु | पे | यि | वा |
| ना | स्प | दं | त्व | म | सि | स | र्व | स | म्प | दाम् |
| दृ | श्य | ते | हि | भ | व | तो | वि | ना | ज | नै |
| र | न्वि | त | स्य | स | चि | वै | रि | व | द्यु | तिः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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