तिष्ठतां तपसि पुण्यमासज-
न्सम्पदोऽनुगुणयन्सुखैषिणाम् ।
योगिनां परिणमन्विमुक्तये
केन नास्तु विनयः सतां प्रियः ॥
तिष्ठतां तपसि पुण्यमासज-
न्सम्पदोऽनुगुणयन्सुखैषिणाम् ।
योगिनां परिणमन्विमुक्तये
केन नास्तु विनयः सतां प्रियः ॥
न्सम्पदोऽनुगुणयन्सुखैषिणाम् ।
योगिनां परिणमन्विमुक्तये
केन नास्तु विनयः सतां प्रियः ॥
सारांश
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सज्जनों की विनयशीलता सबको प्रिय क्यों न हो? यह तपस्वियों को पुण्य, सुख चाहने वालों को अनुकूल संपत्ति और योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तिष्ठतामिति ॥ तपसि तिष्ठतां तपोनिष्ठानाम् । धर्मार्थनामित्यर्थः । पुण्यं धर्ममासजन्संपादयन् ।
स्याद्धर्ममस्त्रियां पुण्यश्रेयसी सुकृतं वृषः इत्यमरः (अमरकोशः १.४.२५ ) । सुखैषिणां सुखार्थिनां संपदः सुखसाधनभूतानर्थाननुगुणयन्ननुकूलयन् । अर्थकामयोरपि हेतुभूत इत्यर्थः। तथा योगिनां विमुक्तयेऽपवर्गाय परिणमन्संपद्यमानो विनयः सौशील्यं केन हेतुना सतां प्रियो नास्तु। संभावनायां लोट् । सर्वथाविनय एव चतुर्वर्गसाधनमित्यर्थः। अतस्त्वया नास्मत्स्वामिशराशैर्ये कार्यमिति तात्पर्यम् ॥ अथवा किं भवादृशेष्वन्यसंभावनया यतो भ्रान्तिरपि संभाव्यत इति मृदूक्तिमवलम्ब्याह
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ति | ष्ठ | तां | त | प | सि | पु | ण्य | मा | स | ज |
| न्स | म्प | दो | ऽनु | गु | ण | य | न्सु | खै | षि | णाम् |
| यो | गि | नां | प | रि | ण | म | न्वि | मु | क्त | ये |
| के | न | ना | स्तु | वि | न | यः | स | तां | प्रि | यः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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