स्फुटपौरुषमापपात पार्थ-
स्तमथ प्राज्यशरः शरं जिघृक्षुः ।
न तथा कृतवेदिनां करिष्य-
न्प्रियतामेति यथा कृतावदानः ॥
स्फुटपौरुषमापपात पार्थ-
स्तमथ प्राज्यशरः शरं जिघृक्षुः ।
न तथा कृतवेदिनां करिष्य-
न्प्रियतामेति यथा कृतावदानः ॥
स्तमथ प्राज्यशरः शरं जिघृक्षुः ।
न तथा कृतवेदिनां करिष्य-
न्प्रियतामेति यथा कृतावदानः ॥
सारांश
AI
अपना पुरुषार्थ सिद्ध कर अर्जुन बाण लेने पहुँचे; क्योंकि केवल कृतज्ञ होने की अपेक्षा महान कार्य सिद्ध करने वाला वीर अधिक प्रिय होता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स्फुटेति ॥ अथ वराहपातानन्तरं पार्थोऽर्जुनः प्राज्यशरः प्रभूतशरः । सन्नपीत्यर्थः।
प्रभूतं प्रचुरं प्राज्यम् इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.६२ ) । स्फुटपौरुषं व्यक्तविक्रमं वराहभेदिनं शरं जिघृक्षुर्ग्रहीतुमिच्छु: । ग्रहे: सन्नन्तादुप्रत्ययः। आपपाताधावति स्म । कृतज्ञतया शरग्रहणम् । न तु लोभादित्यर्थः । नन्वन्येऽप्युपकर्तार एव । किमित्यत्रैवादरस्तस्येत्यत आहकृतवेदिनां कृतज्ञानां कृतावदानः कृतकर्मा । अवदानं कर्म वृत्तम् इत्यमरः (अमरकोशः ३.२.३ ) । यथा प्रियतामेति तथा करिष्यन्नुपकरिष्यन्न प्रियतामेति । कृतकरिष्यमाणयोः कृतं बलीय इति न्यायादिति भावः ॥ अथ युग्मेनाह
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्फु | ट | पौ | रु | ष | मा | प | पा | त | पा | र्थ | |
| स्त | म | थ | प्रा | ज्य | श | रः | श | रं | जि | घृ | क्षुः |
| न | त | था | कृ | त | वे | दि | नां | क | रि | ष्य | |
| न्प्रि | य | ता | मे | ति | य | था | कृ | ता | व | दा | नः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.