सारांश
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रज और तम गुणों को जीतने वाले आपके लिए विजय या मोक्ष कुछ भी दुर्लभ नहीं है; आपके समस्त मनोरथ सहज ही सिद्ध होने योग्य हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विस्मय इति ॥ किंच । जयश्रिया हेतुना । प्राप्तयापीति शेषः । क इव वा विस्मयः किमाश्चर्यम् । न कश्चिदित्यर्थः ।
विस्मयोऽद्भुतमाश्चर्यं चित्रम् इत्यमरः (अमरकोशः १.७.२० ) । अतो मुक्तिरपि ते तव दवीयसी दूरतरा दुर्लभा न भवत्येव स्थूलदूर- (अष्टाध्यायी ६.४.१५६ ) इत्यादिना यणादिपरलोपः पूर्वगुणश्च । तथाहि निर्जितौ रजस्तमसी एव गुणौ येन स कस्येप्सितस्य वाञ्छितस्योपाश्रय आस्पदं न भवेदित्यर्थः ॥ अथागमनप्रयोजनमुपालम्भमुखेनाह
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | स्म | यः | क | इ | व | वा | ज | य | श्रि | या |
| नै | व | मु | क्ति | र | पि | ते | द | वी | य | सी |
| ई | प्सि | त | स्य | न | भ | वे | दु | पा | श्र | यः |
| क | स्य | नि | र्जि | त | र | ज | स्त | मो | गु | णः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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