स समुद्धरता विचिन्त्य तेन
स्वरुचं कीर्तिमिवोत्तमां दधानः ।
अनुयुक्त इव स्ववार्तमुच्चैः
परिरेभे नु भृशं विलोचनाभ्याम् ॥
स समुद्धरता विचिन्त्य तेन
स्वरुचं कीर्तिमिवोत्तमां दधानः ।
अनुयुक्त इव स्ववार्तमुच्चैः
परिरेभे नु भृशं विलोचनाभ्याम् ॥
स्वरुचं कीर्तिमिवोत्तमां दधानः ।
अनुयुक्त इव स्ववार्तमुच्चैः
परिरेभे नु भृशं विलोचनाभ्याम् ॥
सारांश
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अर्जुन ने कीर्ति की तरह चमकते उस बाण को निकाला और बड़े अनुराग से उसे निहारा, मानो वे नेत्रों से उसका आलिंगन कर रहे हों।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ उत्तमां स्वरुचं स्वकान्तिं कीर्तिमिव दधान इत्युत्प्रेक्षा । किं च । विचिन्त्य सर्वथा ग्राह्योऽयमिति विमृष्य समुद्धरता सेनार्जुनेनोच्चैः स्ववार्तं स्वपाटवम् ।
वार्तं पाटवमारोग्यं भव्यं स्वास्थ्यमनामयम् इति यादवः । अनुयुक्तः पृष्ट इव स्थित इत्युत्प्रेक्षा । आदरात्तथा प्रतीयत इत्यर्थः । प्रश्नोऽनुयोगः पृच्छा च इत्यमरः (अमरकोशः १.६.१० ) । स बाणो विलोचनाभ्यां नयनाभ्यां कृत्वा भृशं परिरेभे न्वालिङ्गितः किमित्युत्प्रेक्षा । तेनात्यादरेण दृष्ट इत्यर्थः ॥
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | स | मु | द्ध | र | ता | वि | चि | न्त्य | ते | न | |
| स्व | रु | चं | की | र्ति | मि | वो | त्त | मां | द | धा | नः |
| अ | नु | यु | क्त | इ | व | स्व | वा | र्त | मु | च्चैः | |
| प | रि | रे | भे | नु | भृ | शं | वि | लो | च | ना | भ्याम् |
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