सारांश
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वहाँ अर्जुन ने अचानक एक किरात को देखा, जो भगवान शिव की आज्ञा को मूर्तरूप देने के लिए उनके सामने खड़ा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तत्रेति ॥ तत्र प्रदेशे महाभुजोऽर्जुनः कुसुमचापविद्विषः स्मरारेः शासनं वक्ष्यमाणमादेशं संनिकाशयितुं प्रकाशयितुम् । निवेदयितुमिति यावत् । अग्रतः स्थित कार्मुकभृतं वनेचरं सहसा झटिति पश्यति स्म । इतः प्रभृति रथोद्धतावृत्तम्
रो नराविह रथोद्धता लगौ इति लक्षणात् ॥
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्र | का | र्मु | क | भृ | तं | म | हा | भु | जः |
| प | श्य | ति | स्म | स | ह | सा | व | ने | च | रम् |
| सं | नि | का | श | यि | तु | म | ग्र | तः | स्थि | तं |
| शा | स | नं | कु | सु | म | चा | प | वि | द्वि | षः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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