अयमेव मृगव्यसत्त्रकामः
प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे ।
पृथुभिर्ध्वजिनीस्रवैरकार्षी-
च्चकितोद्भ्रान्तमृगाणि काननानि ॥
अयमेव मृगव्यसत्त्रकामः
प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे ।
पृथुभिर्ध्वजिनीस्रवैरकार्षी-
च्चकितोद्भ्रान्तमृगाणि काननानि ॥
प्रहरिष्यन्मयि मायया शमस्थे ।
पृथुभिर्ध्वजिनीस्रवैरकार्षी-
च्चकितोद्भ्रान्तमृगाणि काननानि ॥
अन्वयः
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शमस्थे मयि मायया प्रहरिष्यन् मृगव्य-सत्त्र-कामः अयम् एव पृथुभिः ध्वजिनी-स्रवैः काननानि चकित-उद्भ्रान्त-मृगाणि अकार्षीत्।
English Summary
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'Or is it this very person (Duryodhana), desirous of a hunting expedition as a pretext, who, intending to strike me by deceit while I am engaged in penance, has made the forests filled with startled and bewildered deer with his vast streams of armies?'
सारांश
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संभवतः यह छद्म शिकारी मुझ पर मायावी प्रहार करना चाहता है, जिसके भय से वन के पशु व्याकुल होकर इधर-उधर भाग रहे हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अयमिति ॥ अयमेव शमस्थे शान्तिनिविष्टे इति रन्ध्रोक्तिः। मयि । अधिकरणविवक्षायां सप्तमी । मायया प्रहरिष्यन् । प्रहर्तुमिच्छन्नित्यर्थः ।
लृट् शेषे च (अष्टाध्यायी ३.३.१३ ) इति चकारात्क्रियार्थायां क्रियांयां लृट् । 'लृटः सद्धा' इति शत्रादेशः । मृगव्यं मृगया तस्य सत्रं वनम् । तदर्थं वनमित्यर्थः । तत्कामयत इति मृगव्यसत्रकामः । मृगयाभूमिपरिग्रहार्थी सन्नित्यर्थः । कर्मण्यण् (अष्टाध्यायी ३.२.१ ) । 'आच्छोदनं मृगव्यं स्यादाखेटो मृगया स्त्रियाम् (अष्टाध्यायी ४.१.३ ) इति, 'सत्रमाच्छादने यज्ञे सदा दाने वनेऽपि च' इति चामरः। पृथुभिर्बृहद्भिर्ध्वजिनीरवैः सेनाकलकलैः स्वमायया कल्पितैरेवेत्यर्थः । काननानि चकितोद्भ्रान्तास्त्रस्तपलायिता मृगायेषु तान्यकार्षीच्चकार । अयमेव रन्ध्रान्वेषी मत्प्रहारार्थं स्वयमेव मृगयुर्भूत्वा वनावरोधाय सेनाघोषं कल्पयामास । स मृगरूपेणागच्छत्तीत्यर्थः ॥ वितर्कान्तरमाह
पदच्छेदः
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| अयम् | इदम् (१.१) | This very one |
| एव | एव | indeed |
| मृगव्य-सत्त्र-कामः | मृगव्य–सत्त्र–काम (१.१) | desirous of a hunting expedition as a pretext |
| प्रहरिष्यन् | प्रहरिष्यत् (प्र√हृ+स्य+शतृ, १.१) | intending to strike |
| मयि | अस्मद् (७.१) | at me |
| मायया | माया (३.१) | by deceit |
| शमस्थे | शमस्थ (७.१) | while at peace |
| पृथुभिः | पृथु (३.३) | with large |
| ध्वजिनी-स्रवैः | ध्वजिनी–स्रव (३.३) | with streams of armies |
| अकार्षीत् | अकार्षीत् (√कृ कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has made |
| चकित-उद्भ्रान्त-मृगाणि | चकित–उद्भ्रान्त–मृग (२.३) | filled with startled and bewildered deer |
| काननानि | कानन (२.३) | the forests |
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | य | मे | व | मृ | ग | व्य | स | त्त्र | का | मः | |
| प्र | ह | रि | ष्य | न्म | यि | मा | य | या | श | म | स्थे |
| पृ | थु | भि | र्ध्व | जि | नी | स्र | वै | र | का | र्षी | |
| च्च | कि | तो | द्भ्रा | न्त | मृ | गा | णि | का | न | ना | नि |
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