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उपकार इवासति प्रयुक्तः
स्थितिमप्राप्य मृगे गतः प्रणाशम् ।
कृतशक्तिरवाङ्मुखो गुरुत्वा-
ज्जनितव्रीड इवात्मपौरुषेण ॥

सारांश AI दुर्जन पर किए उपकार की भाँति वह बाण वराह के शरीर को पार कर, मानो अपने पौरुष से लज्जित होकर भूमि में समा गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) उपकार इति । असति नीचे प्रयुक्त उपकार इव मृगे स्थितिमप्राप्य प्रणाशमदर्शनं गत इत्युपमा । तथा कृतशक्तिः कृतपौरुषो गुरुत्वाल्लोहभाराद्गौरववत्त्वाच्चावाङ्मुखो नम्रमुखः । अत एवात्मपौरुषेण जनितव्रीड इव स्थित इत्युत्प्रेक्षा ।
छन्दः औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
का वा ति प्र यु क्तः
स्थि ति प्रा प्य मृ गे तः प्र णा शम्
कृ क्ति वा ङ्मु खो गु रु त्वा
ज्ज नि व्री वा त्म पौ रु षे
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