सारांश
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अपने प्रभाव से पर्वतों को लघु करते हुए आप मुनि वेश में भी इंद्र के समान ऐश्वर्यशाली प्रतीत हो रहे हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दीपित इति ॥ मुनिरपि । ऐश्वर्यरहितोऽपीत्यर्थः । अनुभावसंपदा प्रभावातिशयेन दीपितः प्रकाशितः ।
अनुभावः प्रभावे च इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२२० ) । गौरवेण महत्तया महीभृतो राज्ञो लघयंल्लघूकुर्वन् । त्वमिहाद्रौ । शतमन्योरिदं शातमन्यवमैन्द्रम् । तस्येदम् (अष्टाध्यायी ४.३.१२० ) इत्यण्प्रत्ययः। शतमन्युर्दिवस्पतिः इत्यमरः (अमरकोशः १.१.५२ ) । अधिपतेः कर्माधिपत्यं त्रैलोक्यरक्षाधिकारम् । ब्राह्मणादित्वात्ष्यञ्प्रत्ययः । कारयन्निव । इन्द्रेणेति शेषः । राजसे तस्याप्युपजीव्य इति प्रतीयसे । स्वमहिम्नेत्यर्थः ।
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दी | पि | त | स्त्व | म | नु | भा | व | स | म्प | दा |
| गौ | र | वे | ण | ल | घ | य | न्म | ही | भृ | तः |
| रा | ज | से | मु | नि | र | पी | ह | का | र | य |
| न्ना | धि | प | त्य | मि | व | शा | त | म | न्य | वम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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