सारांश
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योगशक्ति से जन्म और मृत्यु पर विजय पाने वाले योगी पुरुष बालकों को भी अधर्म के मार्ग से निवृत्त करने के लिए स्वयं उत्तम आचरण का अभ्यास करते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आकुमारमिति ॥ किं च । योगशत्त्यात्मज्ञानमहिम्ना जितौ जन्ममृत्यू यैस्ते यतयो योगिनः । आ कुमारेभ्य आकुमारम् । कुमारादारभ्येत्यर्थः ।
आङ् मर्यादाभिविध्यो। (अष्टाध्यायी २.१.१३ ) इत्यव्ययीभावः । महत्य आपदो यस्मिम्स्तस्मान्महापदः। महानर्थहेतोरित्यर्थः । अपथादमार्गात् । पथो विभाषा (अष्टाध्यायी ५.४.७२ ) इति निषेधविकल्पात्समासान्तः । 'अपथं नपुंसकम् । संनिवृत्तिमपगममुपदेष्टुमिच्छवः सन्तः सुशीलतां सद्वृत्तताम् । 'शीलं स्वभावे सद्वृत्ते' इत्यमरः । शीलयन्त्यभ्यस्यन्ति । अतो न त्याज्यं शीलमित्यर्थः ॥ न केवलं सौशील्यादनर्थनिवृत्तिः । किं त्वर्थप्राप्तिरपीत्याह
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | कु | मा | र | मु | प | दे | ष्टु | मि | च्छ | वः |
| सं | नि | वृ | त्ति | म | प | था | न्म | हा | प | दः |
| यो | ग | श | क्ति | जि | त | ज | न्म | मृ | त्य | वः |
| शी | ल | य | न्ति | य | त | यः | सु | शी | ल | ताम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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