॥ अथ अष्टादशः सर्गः ॥
१८.१
तत उदग्र इव द्विरदे मुनौ
रणमुपेयुषि भीमभुजायुधे ।
धनुरपास्य सबाणधि शंकरः
प्रतिजघान घनैरिव मुष्टिभिः ॥
सारांश AI जब हाथी के समान विशाल और भयंकर भुजाओं वाले मुनि अर्जुन युद्ध के लिए आए, तब शिव ने अपना धनुष और बाण छोड़कर उन पर बादलों के समान भारी मुष्टियों से प्रहार किया।
१८.२
हरपृथासुतयोर्ध्वनिरुत्पत-
न्नमृदुसंवलिताङ्गुलिपाणिजः ।
स्फुटदनल्पशिलारवदारुणः
प्रतिननाद दरीषु दरीभृतः ॥
सारांश AI शिव और अर्जुन के प्रहारों से उत्पन्न ध्वनि, उनकी कठोर अंगुलियों और नाखूनों के घर्षण से निकलकर गुफाओं में गूँजने लगी, जो विशाल शिलाओं के टूटने के समान भयानक थी।
१८.३
शिवभुजाहतिभिन्नपृथुक्षतीः
सुखमिवानुबभूव कपिध्वजः ।
क इव नाम बृहन्मनसां भवे-
दनुकृतेरपि सत्त्ववतां क्षमः ॥
सारांश AI शिव की भुजाओं के प्रहारों से हुए गहरे घावों को अर्जुन ने सुख की भाँति अनुभव किया। महामना और धैर्यवान व्यक्तियों के पराक्रम की बराबरी कौन कर सकता है?
१८.४
व्रणमुखच्युतशोणितशीकर-
स्थगितशैलतटाभभुजान्तरः ।
अभिनवौषसरागभृता बभौ
जलधरेण समानमुमापतिः ॥
सारांश AI घावों से निकलते रक्त की बूंदों से ढके पर्वत के समान विशाल वक्षस्थल वाले अर्जुन, नवीन उषा की लाली से युक्त मेघ के समान सुशोभित हुए।
१८.५
उरसि शूलभृतः प्रहिता मुहुः
प्रतिहतिं ययुरर्जुनमुष्टयः ।
भृशरया इव सह्यमहीभृतः
पृथुनि रोधसि सिन्धुमहोर्मयः ॥
सारांश AI शिव के वक्षस्थल पर प्रहार करती अर्जुन की मुष्टियाँ बार-बार उसी तरह विफल हो रही थीं, जैसे सह्याद्रि पर्वत के विशाल तट से टकराकर समुद्र की वेगवान लहरें लौट जाती हैं।
१८.६
निपतितेऽधिशिरोधरमायते
सममरत्नियुगेऽयुगचक्षुषः ।
त्रिचतुरेषु पदेषु किरीटिना
लुलितदृष्टि मदादिव चस्खले ॥
सारांश AI जब अर्जुन ने अपनी दोनों भुजाओं से शिव की गर्दन पर प्रहार किया, तब शिव अपनी दृष्टि भ्रमित होने के कारण तीन-चार कदम इस प्रकार लड़खड़ाए मानो वे मदमस्त हों।
१८.७
अभिभवोदितमन्युविदीपितः
समभिसृत्य भृशं जवमोजसा ।
भुजयुगेन विभज्य समाददे
शशिकलाभरणस्य भुजद्वयम् ॥
सारांश AI अपमान से उत्पन्न क्रोध से प्रज्वलित अर्जुन ने अत्यंत वेग और ओज के साथ आगे बढ़कर चंद्रमा को धारण करने वाले शिव की दोनों भुजाओं को अपनी भुजाओं से जकड़ लिया।
१८.८
प्रववृतेऽथ महाहवमल्लयो-
रचलसंचलनाहरणो रणः ।
करणशृङ्खलसंकलनागुरु-
र्गुरुभुजायुधगर्वितयोस्तयोः ॥
सारांश AI इसके बाद उन दो महायोद्धाओं के बीच मल्लयुद्ध प्रारंभ हुआ, जो पर्वतों को हिला देने वाला था। अपनी श्रेष्ठ भुजाओं पर गर्व करने वाले उन दोनों का युद्ध दांव-पेंचों के कारण अत्यंत सघन था।
१८.९
अयमसौ भगवानुत पाण्डवः
स्थितमवाङ्मुनिना शशिमौलिना ।
समधिरूढमजेन नु जिष्णुना
स्विदिति वेगवशान्मुमुहे गणैः ॥
सारांश AI शिव के गणों में भ्रम फैल गया कि कौन भगवान शिव हैं और कौन अर्जुन। अत्यंत वेग के कारण वे समझ नहीं पा रहे थे कि कौन नीचे है और कौन ऊपर चढ़ा हुआ है।
१८.१०
प्रचलिते चलितं स्थितमास्थिते
विनमिते नतमुन्नतमुन्नतौ ।
वृषकपिध्वजयोरसहिष्णुना
मुहुरभावभयादिव भूभृता ॥
सारांश AI शिव और अर्जुन के चलने, रुकने, झुकने और उठने के साथ पृथ्वी भी वैसे ही चेष्टाएँ कर रही थी, मानो वह उन दोनों के असहनीय भार से नष्ट होने के भय से काँप रही हो।
१८.११
करणशृङ्खलनिःसृतयोस्तयोः
कृतभुजध्वनि वल्गु विवल्गतोः ।
चरणपातनिपातितरोधसः
प्रससृपुः सरितः परितः स्थलीः ॥
सारांश AI मल्लयुद्ध के दांव-पेंचों से निकलकर जब वे दोनों भुजाओं से ताल ठोकते हुए उछलने लगे, तब उनके चरणों के प्रहार से किनारों को तोड़ती हुई नदियाँ चारों ओर के मैदानों में बहने लगीं।
१८.१२
वियति वेगपरिप्लुतमन्तरा
समभिसृत्य रयेण कपिध्वजः ।
चरणयोश्चरणानमितक्षिति-
र्निजगृहे तिसृणां जयिनं पुराम् ॥
सारांश AI आकाश में वेग से उछलकर अर्जुन ने झपटते हुए त्रिपुरासुर के विजेता शिव के चरणों को पकड़ लिया और अपने पैरों के भार से पृथ्वी को दबा दिया।
१८.१३
विस्मितः सपदि तेन कर्मणा
कर्मणां क्षयकरः परः पुमान् ।
क्षेप्तुकाममवनौ तमक्लमं
निष्पिपेष परिरभ्य वक्षसा ॥
सारांश AI अर्जुन के इस अद्भुत कार्य से चकित होकर कर्मों का क्षय करने वाले परम पुरुष शिव ने, भूमि पर पटकने की इच्छा रखने वाले निष्काम अर्जुन को हृदय से लगाकर मसल दिया।
१८.१४
तपसा तथा न मुदमस्य ययौ
भगवान्यथा विपुलसत्त्वतया ।
गुणसंहतेः समतिरिक्तमहो
निजमेव सत्त्वमुपकारि सताम् ॥
सारांश AI भगवान शिव अर्जुन की तपस्या से उतने प्रसन्न नहीं हुए थे, जितने उनके महान साहस और पराक्रम से हुए। सज्जनों के लिए उनके अपने गुणों के समूह से बढ़कर उनका साहस ही उपकारी होता है।
१८.१५
अथ हिमशुचिभस्मभूषितं
शिरसि विराजितमिन्दुलेखया ।
स्ववपुरतिमनोहरं हरं
दधतमुदीक्ष्य ननाम पाण्डवः ॥
सारांश AI इसके बाद, बर्फ के समान श्वेत भस्म से सुशोभित और मस्तक पर चंद्रमा की कला धारण किए हुए भगवान शिव के अत्यंत मनमोहक वास्तविक रूप को देखकर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया।
१८.१६
सहशरधि निजं तथा कार्मुकं
वपुरतनु तथैव संवर्मितम् ।
निहितमपि तथैव पश्यन्नसिं
वृषभगतिरुपाययौ विस्मयम् ॥
सारांश AI अपने धनुष, बाणों के तुणीर, कवचयुक्त विशाल शरीर और अपनी तलवार को पहले की ही तरह पुनः प्राप्त देखकर अर्जुन अत्यंत विस्मित हो गए।
१८.१७
सिषिचुरवनिमम्बुवाहाः शनैः
सुरकुसुममियाय चित्रं दिवः ।
विमलरुचि भृशं नभो दुन्दुभे-
र्ध्वनिरखिलमनाहतस्यानशे ॥
सारांश AI बादलों ने धीरे-धीरे पृथ्वी को सींचा, आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई, आकाश निर्मल हो गया और बिना बजाए ही बजने वाले दुंदुभियों का शब्द चारों ओर गूँज उठा।
१८.१८
आसेदुषां गोत्रभिदोऽनुवृत्त्या
गोपायकानां भुवनत्रयस्य ।
रोचिष्णुरत्नावलिभिर्विमानै-
र्द्यौराचिता तारकितेव रेजे ॥
सारांश AI तीनों लोकों के रक्षकों और इंद्र के अनुगामी देवताओं के चमकते हुए रत्नों जड़ित विमानों से भरा हुआ आकाश, नक्षत्रों से युक्त रात के समान सुशोभित होने लगा।
१८.१९
हंसा बृहन्तः सुरसद्मवाहाः
संह्रादिकण्ठाभरणाः पतन्तः ।
चक्रुः प्रयत्नेन विकीर्यमाणै-
र्व्योम्नः परिष्वङ्गमिवाग्रपक्षैः ॥
सारांश AI मधुर ध्वनि वाले कंठाभरणों से युक्त और देवताओं के विमानों को ढोने वाले विशाल हंस नीचे उतरते हुए अपने पंखों को फैलाकर मानो आकाश का आलिंगन कर रहे थे।
१८.२०
मुदितमधुलिहो वितानीकृताः
स्रज उपरि वितत्य सातानिकीः ।
जलद इव निषेदिवांसं वृषे
मरुदुपसुखयांबभूवेश्वरम् ॥
सारांश AI प्रसन्न भौरों वाली और ऊपर मंडप की तरह फैली हुई दिव्य मालाओं के साथ वायु ने, नंदी पर मेघ के समान बैठे हुए भगवान शिव को सुख पहुँचाया।
१८.२१
कृतधृति परिवन्दितेनोच्चकै-
र्गणपतिभिरभिन्नरोमोद्गमैः ।
तपसि कृतफले फलज्यायसी
स्तुतिरिति जगदे हरेः सूनुना ॥
सारांश AI शिवगणों द्वारा पूजित अर्जुन ने धैर्यपूर्वक महादेव की स्तुति की। उसने विचार किया कि तपस्या के सफल होने पर की गई स्तुति अधिक फलदायी होती है।
१८.२२
शरणं भवन्तमतिकारुणिकं
भव भक्तिगम्यमधिगम्य जनाः ।
जितमृत्यवोऽजित भवन्ति भये
ससुरासुरस्य जगतः शरणम् ॥
सारांश AI हे शिव! परम दयालु और भक्ति से प्राप्त होने वाले आपकी शरण लेकर मनुष्य मृत्यु को जीत लेते हैं और देवताओं एवं असुरों सहित समस्त संसार के रक्षक बन जाते हैं।
१८.२३
विपदेति तावदवसादकरी
न च कामसम्पदभिकामयते ।
न नमन्ति चैकपुरुषं पुरुषा-
स्तव यावदीश न नतिः क्रियते ॥
सारांश AI हे ईश! जब तक मनुष्य आपके चरणों में भक्तिपूर्वक नहीं झुकता, तब तक वह सांसारिक दुखों से घिरा रहता है, भोगों की लालसा करता है और अन्य मनुष्यों के सामने नतमस्तक होता है।
१८.२४
संसेवन्ते दानशीला विमुक्त्य
सम्पश्यन्तो जन्मदुःखं पुमांसः ।
यन्निःसङ्गस्त्वं फलस्यानतेभ्य-
स्तत्कारुण्यं केवलं न स्वकार्यम् ॥
सारांश AI मोक्ष के अभिलाषी और जन्म के दुखों को जानने वाले पुरुष आपकी सेवा करते हैं। आप जो भक्तों को फल देते हैं, वह आपकी निष्काम करुणा है, उसमें आपका कोई निजी स्वार्थ नहीं है।
१८.२५
प्राप्यते यदिह दूरमगत्वा
यत्फलत्यपरलोकगताय ।
तीर्थमस्ति न भवार्णवबाह्यं
सार्वकामिकम् ऋते भवतस्तत् ॥
सारांश AI हे देव! आपके अतिरिक्त इस संसार में ऐसा कोई तीर्थ नहीं है, जो बिना श्रम के फल दे, परलोक में भी सहायक हो और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।
१८.२६
व्रजति शुचि पदं त्वति प्रीतिमा-
न्प्रतिहतमतिरेति घोरां गतिम् ।
इयमनघ निमित्तशक्तिः परा
तव वरद न चित्तभेदः क्वचित् ॥
सारांश AI हे वरदाता! जो आपसे प्रेम करता है वह उत्तम पद पाता है और जिसकी बुद्धि दूषित है वह घोर गति को प्राप्त होता है। यह आपकी पराशक्ति का प्रभाव है, आप में कोई भेदभाव नहीं है।
१८.२७
दक्षिणां प्रणतदक्षिण मूर्तिं
तत्त्वतः शिवकरीमविदित्वा ।
रागिणापि विहिता तव भक्त्या
संस्मृतिर्भव भवत्यभवाय ॥
सारांश AI हे शिव! आपकी कल्याणकारी दक्षिणामूर्ति के वास्तविक स्वरूप को न जानते हुए भी यदि कोई रागी व्यक्ति भक्ति से आपका स्मरण करता है, तो वह उसके संसार-बन्धन को काट देता है।
१८.२८
दृष्ट्वा दृश्यान्याचरणीयानि विधाय
प्रेक्षाकारी याति पदं मुक्तमपायैः ।
सम्यग्दृष्टिस्तस्य परं पश्यति यस्त्वां
यश्चोपास्ति साधु विधेयं स विधत्ते ॥
सारांश AI विचारशील पुरुष कर्तव्यों का पालन कर मोक्ष पाता है। जो आपकी उपासना करता है, वह सम्यक दृष्टि प्राप्त कर परम तत्व को देखता है और शास्त्रसम्मत कार्यों को पूर्ण करता है।
१८.२९
युक्ताः स्वशक्त्या मुनयः प्रजानां
हितोपदेशैरुपकारवन्तः ।
समुच्छिनत्सि त्वमचिन्त्यधामा
कर्माण्युपेतस्य दुरुत्तराणि ॥
सारांश AI हे अचिन्त्य महिमा वाले! मुनिजन तो केवल उपदेशों से उपकार करते हैं, किन्तु आप अपनी शक्ति से शरणागत के उन प्रारब्ध कर्मों को भी नष्ट कर देते हैं जिन्हें पार करना असम्भव है।
१८.३०
संनिबद्धमपहर्तुमहार्यं
भूरि दुर्गतिभयं भुवनानाम् ।
अद्भुताकृतिमिमामतिमाय-
स्त्वं बिभर्षि करुणामय मायाम् ॥
सारांश AI हे करुणामय! संसार के अपार दुखों और दुर्गति के भय को दूर करने के लिए आप अपनी असीम माया से इस अद्भुत किरात रूप को धारण करते हैं।
१८.३१
न रागि चेतः परमा विलासिता
वधूः शरीरेऽस्ति न चास्ति मन्मथः ।
नमस्क्रिया चोषसि दातुरित्यहो
निसर्गदुर्बोधमिदं तवेहितम् ॥
सारांश AI हे देव! आपके हृदय में राग नहीं है फिर भी वाम भाग में पार्वती हैं, कामदेव नहीं है फिर भी आप वरदाता हैं। आपकी यह चेष्टा स्वभाव से ही अत्यन्त रहस्यमयी और दुर्बोध है।
१८.३२
तवोत्तरीयं करिचर्म साङ्गजं
ज्वलन्मणिः सारशनं महानहिः ।
स्रगास्यपङ्क्तिः शवभस्म चन्दनं
कला हिमांशोश्च समं चकासति ॥
सारांश AI आपके शरीर पर गजचर्म, करधनी के रूप में सर्प और मणि, मुण्डमाला, भस्म और मस्तक पर चन्द्रकला - ये सब परस्पर विरोधी वस्तुएँ एक साथ सुशोभित होकर आपकी शोभा बढ़ाती हैं।
१८.३३
अविग्रहस्याप्यतुलेन हेतुना
समेतभिन्नद्वयमूर्ति तिष्ठतः ।
तवैव नान्यस्य जगत्सु दृश्यते
विरुद्धवेषाभरणस्य कान्तता ॥
सारांश AI निराकार होते हुए भी आप शिव और किरात के दो भिन्न रूपों में स्थित हैं। परस्पर विरोधी वेश और आभूषणों को धारण करने पर भी ऐसी अनुपम सुन्दरता केवल आप में ही संभव है।
१८.३४
आत्मलाभपरिणामनि-
रोधैर्भूतसंघ इव न त्वमुपेतः ।
तेन सर्वभुवनातिग
लोके नोपमानमसि नाप्युपेमयः ॥
सारांश AI हे सर्वलोकातिग! आप पंचभूतों की भाँति जन्म, विकास और विनाश के अधीन नहीं हैं। इसलिए इस संसार में न तो कोई आपके समान है और न ही आपकी तुलना किसी से की जा सकती है।
१८.३५
त्वमन्तकः स्थावरजङ्गमानां
त्वया जगत्प्राणिति देव विश्वम् ।
त्वं योगिनां हेतुफले रुणत्सि
त्वं कारणं कारणकारणानाम् ॥
सारांश AI हे देव! आप ही चराचर जगत के संहारक हैं और आप ही से समस्त संसार जीवन पाता है। आप योगियों के कर्मफलों का निरोध करते हैं और समस्त कारणों के आदि कारण हैं।
१८.३६
रक्षोभिः सुरमनुजैर्दितेः सुतैर्वा
यल्लोकेष्वविकलमाप्तमाधिपत्यम्
पाविन्याः शरणगतार्तिहारिणे
तन्माहात्म्यं भव भवते नमस्क्रियाय्-
आः
सारांश AI हे शिव! असुरों, देवताओं और मनुष्यों ने लोकों में जो अखण्ड ऐश्वर्य प्राप्त किया है, वह आपकी शरण में आने वाले भक्तों के कष्ट हरने वाली आपको की गई नमस्कार रूपी महिमा का ही फल है।
१८.३७
तरसा भुवनानि यो बिभर्ति
ध्वनति ब्रह्म यतः परं पवित्रम् ।
परितो दुरितानि यः पुनीते
शिव तस्मै पवनातने नमस्ते ॥
सारांश AI हे शिव! जो अपने वेग से लोकों को धारण करते हैं, जिनसे पवित्र वेदमन्त्र प्रकट होते हैं और जो समस्त पापों को धो देते हैं, उस वायु स्वरूप आपको नमस्कार है।
१८.३८
भवतः स्मरतां सदासने
जयिनि ब्रह्ममये निषेदुषाम् ।
दहते भवबीजसंततिं
शिखिनेऽनेकशिखाय ते नमः ॥
सारांश AI हे विजयी शिव! जो सदा ब्रह्ममयी आसन पर स्थित होकर आपका ध्यान करते हैं, उनके संसार रूपी बीज को दग्ध करने वाली आपकी अनेक शिखाओं वाली अग्नि स्वरूप को नमस्कार है।
१८.३९
आबाधामरणभयार्चिषा चिराय
प्लुष्टेभ्यो भव महता भवानलेन ।
निर्वाणं समुपगमेन यच्छते ते
बीजानां प्रभव नमोऽस्तु जीवनाय ॥
सारांश AI हे जीवनदाता! जन्म-मरण के भय की अग्नि से झुलसे हुए जीवों को मोक्ष रूपी शांति प्रदान करने वाले और संसार के उत्पत्ति स्थल आपको बारम्बार नमस्कार है।
१८.४०
यः सर्वेषामावरीता वरीया-
न्सर्वैर्भावैर्नावृतोऽनादिनिष्ठः ।
मार्गातीतायेन्द्रियाणां नमस्ते-
ऽविज्ञेयाय व्योमरूपाय तस्मै ॥
सारांश AI जो सबको आच्छादित करने वाले महान हैं किन्तु स्वयं किसी से आवृत नहीं होते, जो इन्द्रियों की पहुँच से परे और अनादि हैं, उन आकाश रूपी आपको नमस्कार है।
१८.४१
अणीयसे विश्वविधारिणे नमो
नमोऽन्तिकस्थाय नमो दवीयसे ।
अतीत्य वाचां मनसां च गोचरं
स्थिताय ते तत्पतये नमो नमः ॥
सारांश AI सूक्ष्म स्वरूप वाले, सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाले, निकट और दूर स्थित रहने वाले तथा वाणी और मन की पहुँच से परे उस परात्पर परमेश्वर को बार-बार नमस्कार है।
१८.४२
असंविदानस्य ममेश संविदां
तितिक्षितुं दुश्चरितं त्वमर्हसि ।
विरोध्य मोहात्पुनरभ्युपेयुषां
गतिर्भवानेव दुरात्मनामपि ॥
सारांश AI हे ईश! अज्ञानवश किए गए मेरे अनुचित व्यवहार को आप क्षमा करें। मोह के कारण विरोध करके पुनः शरण में आने वाले दुरात्माओं के लिए भी आप ही एकमात्र गति हैं।
१८.४३
आस्तिक्यशुद्धमवतः प्रियधर्म धर्मं
धर्मात्मजस्य विहितागसि शत्रुवर्गे ।
सम्प्राप्नुयां विजयमीश यया समृद्ध्या
तां भूतनाथ विभुतां वितराहवेषु ॥
सारांश AI हे प्रियधर्म भूतनाथ! अपराध करने वाले शत्रुओं के विरुद्ध धर्मराज युधिष्ठिर के धर्म की रक्षा हेतु युद्धों में जिस वैभव से मैं विजय प्राप्त कर सकूँ, वह सामर्थ्य मुझे प्रदान करें।
१८.४४
इति निगदितवन्तं सूनुमुच्चैर्मघोनः
प्रणतशिरसमीशः सादरं सान्त्वयित्वा ।
ज्वलदनलपरीतं रौद्रमस्त्रं दधानं
धनुरुपपदमस्मै वेदमभ्यादिदेश ॥
सारांश AI इस प्रकार प्रार्थना करने वाले नतमस्तक अर्जुन को भगवान शिव ने सांत्वना दी और उन्हें प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी पाशुपत अस्त्र तथा धनुर्वेद का उपदेश दिया।
१८.४५
स पिङ्गाक्षः श्रीमान्भुवनमहनीयेन महसा
तनुं भीमां बिभ्रत्त्रिगुणपरिवारप्रहरणः ।
परीत्येशानं त्रिः स्तुतिभिरुपगीतः सुरगणैः
सुतं पाण्डोर्वीरं जलदमिव भास्वानभिययौ ॥
सारांश AI पिङ्गल नेत्रों वाले और तेजस्वी शरीर धारण किए हुए अर्जुन ने शिव की तीन बार प्रदक्षिणा की। देवगणों द्वारा स्तुत वे वीर पाण्डुपुत्र, मेघ की ओर बढ़ते सूर्य के समान सुशोभित हुए।
१८.४६
अथ शशधरमौलेरभ्यनुज्ञामवाप्य
त्रिदशपतिपुरोगाः पूर्णकामाय तस्मै ।
अवितथफलमाशिर्वादमारोपयन्तो
विजयि विविधमस्त्रं लोकपाला वितेरुः ॥
सारांश AI भगवान शिव की अनुमति पाकर इन्द्र आदि लोकपालों ने सिद्ध मनोरथ वाले अर्जुन को अमोघ आशीर्वाद देते हुए विजय प्रदान करने वाले विविध प्रकार के दिव्य अस्त्र प्रदान किए।
१८.४७
असंहार्योत्साहं जयिनमुदयं प्राप्य तरसा
धुरं गुर्वीं वोढुं स्थितमनवसादाय जगतः ।
स्वधाम्ना लोकानां तमुपरि कृतस्थानममरा-
स्तपोलक्ष्म्या दीप्तं दिनकृतमिवोच्चैरुपजगुः ॥
सारांश AI अदम्य उत्साह वाले और तपस्या के तेज से सूर्य के समान देदीप्यमान अर्जुन, जो जगत के कल्याण हेतु गुरुतर भार उठाने को तत्पर थे, देवताओं द्वारा उच्च स्वर में स्तुत किए गए।
१८.४८
व्रज जय रिपुलोकं पादपद्मानतः
सन्गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघ्- ।
ऐः निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो
धृतगुरुजयलक्ष्मीर्धर्मसूनुं ननाम ॥
सारांश AI शिव से शत्रुओं पर विजय का आशीर्वाद पाकर और देवगणों द्वारा प्रशंसित होकर अर्जुन अपने निवास लौटे और विजयलक्ष्मी धारण कर धर्मराज युधिष्ठिर के चरणों में सादर प्रणाम किया।
॥ इति अष्टादशः सर्गः ॥
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