दृष्ट्वा दृश्यान्याचरणीयानि विधाय
प्रेक्षाकारी याति पदं मुक्तमपायैः ।
सम्यग्दृष्टिस्तस्य परं पश्यति यस्त्वां
यश्चोपास्ति साधु विधेयं स विधत्ते ॥
दृष्ट्वा दृश्यान्याचरणीयानि विधाय
प्रेक्षाकारी याति पदं मुक्तमपायैः ।
सम्यग्दृष्टिस्तस्य परं पश्यति यस्त्वां
यश्चोपास्ति साधु विधेयं स विधत्ते ॥
प्रेक्षाकारी याति पदं मुक्तमपायैः ।
सम्यग्दृष्टिस्तस्य परं पश्यति यस्त्वां
यश्चोपास्ति साधु विधेयं स विधत्ते ॥
अन्वयः
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प्रेक्षाकारी दृश्यानि दृष्ट्वा आचरणीयानि विधाय अपायैः मुक्तम् पदम् याति । यः त्वाम् पश्यति सः सम्यग्दृष्टिः (भवति), सः तस्य परम् (तत्त्वम्) पश्यति । यः च (त्वाम्) उपास्ति सः साधु विधेयम् विधत्ते ।
English Summary
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A discerning person, having seen what is to be seen and done what is to be done, attains a state free from calamities. He who sees You has the right vision and sees the supreme reality beyond it. And he who worships You properly performs what ought to be done.
सारांश
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विचारशील पुरुष कर्तव्यों का पालन कर मोक्ष पाता है। जो आपकी उपासना करता है, वह सम्यक दृष्टि प्राप्त कर परम तत्व को देखता है और शास्त्रसम्मत कार्यों को पूर्ण करता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दृष्ट्वेति ॥ प्रेक्षया बुद्ध्या करोतीति प्रेक्षाकारी विमृष्यकारी दृश्यानि द्रष्टव्यानि दृष्ट्वा ज्ञात्वाचरणीयानि कर्तव्यानि च विधाय कृत्वापायैर्मुक्तं नाशवर्जितं पदं याति।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते इति श्रुतेः । ज्ञानकर्मभ्यां मुक्तिरित्यर्थः । किंतु ते अपि ज्ञानकर्मणी त्वद्विषय एव मुक्तिसाधनं नान्यविषय इत्याशयेनाह-सम्यगिति। यः पुमान्परं पुरुषोत्तमत्वेन सर्वोत्कृष्टं त्वां पश्यति तस्य सम्यग्दृष्टिः सम्यग्ज्ञानम् । थश्च त्वामुपास्ते सेवते स एव साधु विधेयं विधत्ते । साधुकारीत्यर्थः । मत्तमयूरं वृत्तम् । लक्षणं तूक्तम् ॥ यु क्ताः स्वशक्त्या मुनयः प्रजानां हितोपदेशैरुपकारवन्तः । समुच्छिनत्सि त्वमचिन्त्यधामा कर्माण्युपेतस्य दु रुत्तराणि
पदच्छेदः
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| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| दृश्यानि | दृश्य (√दृश्+यत्, २.३) | what is to be seen |
| आचरणीयानि | आचरणीय (आ√चर्+अनीयर्, २.३) | what is to be done |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having done |
| प्रेक्षाकारी | प्रेक्षाकारिन् (प्र√ईक्ष्+णिनि, १.१) | a discerning person |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| पदम् | पद (२.१) | a state |
| मुक्तम् | मुक्त (√मुच्+क्त, २.१) | free |
| अपायैः | अपाय (३.३) | from calamities |
| सम्यग्दृष्टिः | सम्यच्–दृष्टि (१.१) | one with the right vision |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| परम् | पर (२.१) | the supreme |
| पश्यति | पश्यति (√दृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sees |
| यः | यद् (१.१) | he who |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | You |
| यः | यद् (१.१) | he who |
| च | च | and |
| उपास्ति | उपास्ति (उप√आस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | worships |
| साधु | साधु | properly |
| विधेयम् | विधेय (वि√धा+यत्, २.१) | what ought to be done |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विधत्ते | विधत्ते (वि√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | performs |
छन्दः
मत्तमयूरम् [१३: मतयसग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | ष्ट्वा | दृ | श्या | न्या | च | र | णी | या | नि | वि | धा | य |
| प्रे | क्षा | का | री | या | ति | प | दं | मु | क्त | म | पा | यैः |
| स | म्य | ग्दृ | ष्टि | स्त | स्य | प | रं | प | श्य | ति | य | स्त्वां |
| य | श्चो | पा | स्ति | सा | धु | वि | धे | यं | स | वि | ध | त्ते |
| म | त | य | स | ग | ||||||||
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