अन्वयः
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अजित! शरण! अतिकारुणिकम्, भक्तिगम्यम्, ससुरासुरस्य जगतः शरणम् भवन्तम् शरणम् अधिगम्य, जनाः जितमृत्यवः भवन्ति, भये न भवन्ति ।
English Summary
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O Unconquered One (Ajita)! O Bhava! O Refuge! By attaining You—who are exceedingly compassionate, accessible through devotion, and the shelter for the world of gods and demons—people conquer death and are freed from fear.
सारांश
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हे शिव! परम दयालु और भक्ति से प्राप्त होने वाले आपकी शरण लेकर मनुष्य मृत्यु को जीत लेते हैं और देवताओं एवं असुरों सहित समस्त संसार के रक्षक बन जाते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
शरणमिति ॥ हे अजित अपराजित हे भव, अतिकारुणिकमतिदयालुम् । 'तदस्य
प्रयोजनम् (अष्टाध्यायी ५.१.१०९ ) इति ठक् । भक्तिगम्यं भक्तिमात्रसुलभं भवन्तं शरणं रक्षकमधिगम्य जितमृत्यवो विगतमरणाः ।अमरा भूत्वेत्यर्थः । जनाः ससुरासुरस्य जगतो भय आपदि शरणं स्वयं रक्षितारो भवन्ति । 'शरणं गृहरक्षित्रोः' इति विश्वः । प्रमिताक्षरावृत्तम् ॥
पदच्छेदः
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| शरणम् | शरण (२.१) | as refuge |
| भवन्तम् | भवत् (२.१) | You |
| अतिकारुणिकम् | अतिकारुणिक (२.१) | exceedingly compassionate |
| भव | भव (८.१) | O Bhava |
| भक्तिगम्यम् | भक्ति–गम्य (√गम्+यत्, २.१) | accessible through devotion |
| अधिगम्य | अधिगम्य (अधि√गम्+ल्यप्) | having attained |
| जनाः | जन (१.३) | people |
| जितमृत्यवः | जित (√जि+क्त)–मृत्यु (१.३) | conquer death |
| अजित | अजित (८.१) | O Unconquered One |
| भवन्ति | भवन्ति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become |
| भये | भय (७.१) | in fear |
| ससुरासुरस्य | स–सुर–असुर (६.१) | of the world with gods and demons |
| जगतः | जगत् (६.१) | of the world |
| शरणम् | शरण (८.१) | O Refuge |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | र | णं | भ | व | न्त | म | ति | का | रु | णि | कं |
| भ | व | भ | क्ति | ग | म्य | म | धि | ग | म्य | ज | नाः |
| जि | त | मृ | त्य | वो | ऽजि | त | भ | व | न्ति | भ | ये |
| स | सु | रा | सु | र | स्य | ज | ग | तः | श | र | णम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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