अविग्रहस्याप्यतुलेन हेतुना
समेतभिन्नद्वयमूर्ति तिष्ठतः ।
तवैव नान्यस्य जगत्सु दृश्यते
विरुद्धवेषाभरणस्य कान्तता ॥
अविग्रहस्याप्यतुलेन हेतुना
समेतभिन्नद्वयमूर्ति तिष्ठतः ।
तवैव नान्यस्य जगत्सु दृश्यते
विरुद्धवेषाभरणस्य कान्तता ॥
समेतभिन्नद्वयमूर्ति तिष्ठतः ।
तवैव नान्यस्य जगत्सु दृश्यते
विरुद्धवेषाभरणस्य कान्तता ॥
अन्वयः
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अतुलेन हेतुना अविग्रहस्य अपि समेतभिन्नद्वयमूर्ति तिष्ठतः, विरुद्धवेषाभरणस्य तव एव कान्तता जगत्सु दृश्यते, अन्यस्य न ।
English Summary
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Though You are formless, for an incomparable reason You exist with a dual form, both immanent and transcendent. This loveliness, despite contradictory attire and ornaments, is seen in the worlds only in You and in no one else.
सारांश
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निराकार होते हुए भी आप शिव और किरात के दो भिन्न रूपों में स्थित हैं। परस्पर विरोधी वेश और आभूषणों को धारण करने पर भी ऐसी अनुपम सुन्दरता केवल आप में ही संभव है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अविग्रहस्येति ॥ अविग्रहस्य वस्तुतोऽशरीरस्यापि सतोऽतुलेन दुर्बोधत्वादसदृशेन हेतुना । केनापि कारणेनेत्यर्थः। समेता संगता भिन्ना विलक्षणा च द्वयी द्विविधा स्त्रीपुंसात्मिका मूर्तिर्यस्मिन्कर्मणि तत्समेतभिन्नद्वयमूर्ति यथा तथा तिष्ठतः। अशरीरस्य शरीरमेव विरुद्धम् । तदपि नारीनरात्मकमिति किमतश्चित्रमस्तीति भावः। एवंविधस्य तवैव जगत्सु विरुद्धे वेषाभरणे पूर्वोक्ते यस्य तस्य विरुद्धवेषाभरणस्यापि सतः कान्तता रमणीयता दृश्यते । अन्यस्य न दृश्यते । तस्मादचिन्त्योऽसौ तव महिमेति भावः॥
पदच्छेदः
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| अविग्रहस्य | अविग्रह (६.१) | of the formless one |
| अपि | अपि | even |
| अतुलेन | अतुल (३.१) | by an incomparable |
| हेतुना | हेतु (३.१) | reason |
| समेतभिन्नद्वयमूर्ति | समेत (सम्√इ+क्त)–भिन्न (√भिद्+क्त)–द्वय–मूर्ति (६.१) | of one who has a dual form, both immanent and transcendent |
| तिष्ठतः | तिष्ठत् (√स्था+शतृ, ६.१) | of one who exists |
| तव | युष्मद् (६.१) | Your |
| एव | एव | only |
| न | न | not |
| अन्यस्य | अन्य (६.१) | of another |
| जगत्सु | जगत् (७.३) | in the worlds |
| दृश्यते | दृश्यते (√दृश् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is seen |
| विरुद्धवेषाभरणस्य | विरुद्ध–वेष–आभरण (६.१) | of one with contradictory attire and ornaments |
| कान्तता | कान्तता (१.१) | loveliness |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | वि | ग्र | ह | स्या | प्य | तु | ले | न | हे | तु | ना |
| स | मे | त | भि | न्न | द्व | य | मू | र्ति | ति | ष्ठ | तः |
| त | वै | व | ना | न्य | स्य | ज | ग | त्सु | दृ | श्य | ते |
| वि | रु | द्ध | वे | षा | भ | र | ण | स्य | का | न्त | ता |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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