अथ शशधरमौलेरभ्यनुज्ञामवाप्य
त्रिदशपतिपुरोगाः पूर्णकामाय तस्मै ।
अवितथफलमाशिर्वादमारोपयन्तो
विजयि विविधमस्त्रं लोकपाला वितेरुः ॥
अथ शशधरमौलेरभ्यनुज्ञामवाप्य
त्रिदशपतिपुरोगाः पूर्णकामाय तस्मै ।
अवितथफलमाशिर्वादमारोपयन्तो
विजयि विविधमस्त्रं लोकपाला वितेरुः ॥
त्रिदशपतिपुरोगाः पूर्णकामाय तस्मै ।
अवितथफलमाशिर्वादमारोपयन्तो
विजयि विविधमस्त्रं लोकपाला वितेरुः ॥
अन्वयः
AI
अथ त्रिदशपतिपुरोगाः लोकपालाः शशधरमौलेः अभ्यनुज्ञाम् अवाप्य, पूर्णकामाय तस्मै अवितथफलम् आशीर्वादम् आरोपयन्तः, विजयि विविधम् अस्त्रम् वितेरुः ।
English Summary
AI
Then, having obtained permission from Shiva, the Lokapalas, led by Indra, bestowed upon Arjuna, whose desire was now fulfilled, various victorious weapons, while offering blessings that would yield unfailing results.
सारांश
AI
भगवान शिव की अनुमति पाकर इन्द्र आदि लोकपालों ने सिद्ध मनोरथ वाले अर्जुन को अमोघ आशीर्वाद देते हुए विजय प्रदान करने वाले विविध प्रकार के दिव्य अस्त्र प्रदान किए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥अथ शशधरमौलिवरप्रदानानन्तरं त्रिदशपतिपुरोगा इन्द्रादयो लोकपालाः शशधरमौले: शंभोरभ्यनुज्ञामवाप्य पूर्णकामाय तस्मै पाण्डवायावितथफलममोघफलमाशीर्वादमारोपयन्तः प्रयुञ्जाना विजयि जयशीलं विविधं नानाविधमस्त्रमैन्द्रादिकं वितेरुर्ददुः । मालिनीवृत्तम् ॥
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | Then |
| शशधरमौलेः | शशधर–मौलि (६.१) | from the one with the moon on his crest (Shiva) |
| अभ्यनुज्ञाम् | अभ्यनुज्ञा (अभि+अनु√ज्ञा+अ, २.१) | permission |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| त्रिदशपतिपुरोगाः | त्रिदशपति–पुरोग (१.३) | led by the lord of the gods (Indra) |
| पूर्णकामाय | पूर्ण–काम (४.१) | to him whose desire was fulfilled |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him (Arjuna) |
| अवितथफलम् | अवितथ–फल (२.१) | of unfailing result |
| आशीर्वादम् | आशीर्वाद (२.१) | blessing |
| आरोपयन्तः | आरोपयत् (आ√रुह्+णिच्+शतृ, १.३) | bestowing |
| विजयि | विजयिन् (२.१) | victorious |
| विविधम् | विविध (२.१) | various |
| अस्त्रम् | अस्त्र (२.१) | weapons |
| लोकपालाः | लोकपाल (१.३) | the guardians of the world |
| वितेरुः | वितेरुः (वि√तॄ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | gave |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | श | श | ध | र | मौ | ले | र | भ्य | नु | ज्ञा | म | वा | प्य |
| त्रि | द | श | प | ति | पु | रो | गाः | पू | र्ण | का | मा | य | त | स्मै |
| अ | वि | त | थ | फ | ल | मा | शि | र्वा | द | मा | रो | प | य | न्तो |
| वि | ज | यि | वि | वि | ध | म | स्त्रं | लो | क | पा | ला | वि | ते | रुः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.