संसेवन्ते दानशीला विमुक्त्य
सम्पश्यन्तो जन्मदुःखं पुमांसः ।
यन्निःसङ्गस्त्वं फलस्यानतेभ्य-
स्तत्कारुण्यं केवलं न स्वकार्यम् ॥
संसेवन्ते दानशीला विमुक्त्य
सम्पश्यन्तो जन्मदुःखं पुमांसः ।
यन्निःसङ्गस्त्वं फलस्यानतेभ्य-
स्तत्कारुण्यं केवलं न स्वकार्यम् ॥
सम्पश्यन्तो जन्मदुःखं पुमांसः ।
यन्निःसङ्गस्त्वं फलस्यानतेभ्य-
स्तत्कारुण्यं केवलं न स्वकार्यम् ॥
अन्वयः
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जन्मदुःखम् सम्पश्यन्तः दानशीलाः पुमांसः विमुक्त्यै (त्वाम्) संसेवन्ते । त्वम् निःसङ्गः (सन्) आनतेभ्यः यत् (ददासि) तत् केवलम् कारुण्यम्, न फलस्य स्वकार्यम् ।
English Summary
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Men of charitable nature, seeing the sorrow of birth, serve you for liberation. Since you are detached from the fruit of actions, your giving to those who bow to you is purely out of compassion, not for any self-interest.
सारांश
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मोक्ष के अभिलाषी और जन्म के दुखों को जानने वाले पुरुष आपकी सेवा करते हैं। आप जो भक्तों को फल देते हैं, वह आपकी निष्काम करुणा है, उसमें आपका कोई निजी स्वार्थ नहीं है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संसेवन्त इति ॥ दानं शीलं स्वभावो निजधर्मो येषां ते दानशीला: त्वामेवोद्दिश्य दानं कुर्वन्त इत्यर्थः ।
तस्माद्दानं परमं वदन्ति इति श्रुतेरिति भावः। कुतः । यतो जन्मदुःखं संपश्यन्तोऽनुभवन्तः पुमांसो विमुक्त्यै मोक्षाय संसेवन्ते । भवन्तमिति शेषः। न च तच्चित्रम् । किंत्वानतेभ्यः प्रणम्रेभ्यो निःसङ्गो निस्पृहस्त्वं यत्फलसि फलं ददासि । तेषां फलार्थित्वादिति भावः । तत्केवलं निरुपाधिकं कारुण्यं करुणा। स्वार्थे ष्यञ् । कारुण्यं करुणा धृणा इत्यमरः (अमरकोशः १.७.१९ ) । न स्वकार्यम् । एतदेव चित्रम् । केवलं परार्थत्वादिति भावः। शालिनीवृत्तम् ॥ प्राप्यते यदिहं दूरमगत्वा यत्फलत्यपरलोकगताय । तीर्थमस्ति न भवार्णवबाह्यं सार्वकामिकमृते भवतस्तत्
पदच्छेदः
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| संसेवन्ते | संसेवन्ते (सम्√सेव् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | serve |
| दानशीलाः | दान–शील (१.३) | those of a charitable nature |
| विमुक्त्यै | विमुक्ति (वि√मुच्+क्तिन्, ४.१) | for liberation |
| सम्पश्यन्तः | सम्पश्यत् (सम्√दृश्+शतृ, १.३) | seeing |
| जन्मदुःखम् | जन्मन्–दुःख (२.१) | the sorrow of birth |
| पुमांसः | पुंस् (१.३) | men |
| यत् | यद् (१.१) | that which (you give) |
| निःसङ्गः | निःसङ्ग (१.१) | detached |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | You |
| फलस्य | फल (६.१) | of the fruit (of action) |
| आनतेभ्यः | आनत (आ√नम्+क्त, ४.३) | to those who bow |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| कारुण्यम् | कारुण्य (१.१) | is compassion |
| केवलम् | केवल (१.१) | purely |
| न | न | not |
| स्वकार्यम् | स्वकार्य (१.१) | for self-interest |
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | से | व | न्ते | दा | न | शी | ला | वि | मु | क्त्य |
| स | म्प | श्य | न्तो | ज | न्म | दुः | खं | पु | मां | सः |
| य | न्निः | स | ङ्ग | स्त्वं | फ | ल | स्या | न | ते | भ्य |
| स्त | त्का | रु | ण्यं | के | व | लं | न | स्व | का | र्यम् |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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