अन्वयः
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ईश! यावत् तव नतिः न क्रियते, तावत् विपद् अवसादकरी (भवति), (जनः) कामसम्पदम् च न अभिकामयते, पुरुषाः च एकपुरुषम् न नमन्ति ।
English Summary
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O Lord! As long as obeisance is not made to You, adversity remains disheartening, one does not attain desired prosperity, and men do not bow to any single person as supreme.
सारांश
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हे ईश! जब तक मनुष्य आपके चरणों में भक्तिपूर्वक नहीं झुकता, तब तक वह सांसारिक दुखों से घिरा रहता है, भोगों की लालसा करता है और अन्य मनुष्यों के सामने नतमस्तक होता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विपदिति ॥ हे ईश, यावत्तव नतिः प्रणामो न क्रियते । पुरुषेणेति शेषः । तावदेवैकं पुरुषमेकाकिनं सन्तमवसादकरी क्षयकरी विपदेति प्राप्नोति । कामसंपन्मनोरथसंपच्च नाभिकामयते नेच्छति। पुरुषाश्चान्ये लोकास्तमेकं पुरुषं तव स्तुतिमकुर्वाणं न नमन्ति न वशे वर्तन्ते। नानिष्टनिवृत्तिर्नापीष्टप्राप्तिरित्यर्थः । यदा तु त्वां प्रणमन्ति तदैव सर्वं लभ्यत इति भावः ॥
पदच्छेदः
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| विपद् | विपद् (१.१) | adversity |
| इति | इति | thus |
| तावत् | तावत् | so long |
| अवसादकरी | अवसाद–अवसादकरिन् (√कृ+णिनि, १.१) | is despair-causing |
| न | न | not |
| च | च | and |
| कामसम्पदम् | काम–सम्पद् (२.१) | desired prosperity |
| अभिकामयते | अभिकामयते (अभि√कम् +णिच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | desires |
| न | न | not |
| नमन्ति | नमन्ति (√नम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bow |
| च | च | and |
| एकपुरुषम् | एकपुरुष (२.१) | to one person |
| पुरुषाः | पुरुष (१.३) | men |
| तव | युष्मद् (६.१) | to You |
| यावत् | यावत् | as long as |
| ईश | ईश (८.१) | O Lord |
| न | न | not |
| नतिः | नति (√नम्+क्तिन्, १.१) | obeisance |
| क्रियते | क्रियते (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is made |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | प | दे | ति | ता | व | द | व | सा | द | क | री |
| न | च | का | म | स | म्प | द | भि | का | म | य | ते |
| न | न | म | न्ति | चै | क | पु | रु | षं | पु | रु | षा |
| स्त | व | या | व | दी | श | न | न | तिः | क्रि | य | ते |
| स | ज | स | स | ||||||||
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